.रंजन दास गुप्ता
कैरिबियाई देश क्यूबा में विदेशी क्रांतिकारियों की प्रतिमा लगाकर उन्हें सम्मानित करने की परंपरा है। पिछले वर्ष वहां की इंस्तीत्यूतो क्यूबेनो दे अमिस्ताद कॉन लॉस प्यूएब्लोस (आईसीएपी) नामक संस्था ने वहां शहीद भगत सिंह की प्रतिमा लगाने की पेशकश की थी। तकनीकी रूप से किसी संस्था को आईसीएपी को प्रतिमा दान में देनी होती है और फिर वह क्यूबा में स्थापित की जाती है।
शनिवार को भगत सिहं की 107वीं जयंती के मौके पर यह जानना सुखद है कि आम आदमी पार्टी ने इस अभियान को समर्थन दिया है, लेकिन अभी उतनी जागरूकता नहीं है। यह खेद का विषय है कि हमारे शहीदों को अपनी मातृभूमि की बजाय विदेश में ज्यादा सम्मान मिलता है। यह बड़ी अजीब बात है कि देश में शहीद का दर्जा उन्हें ही दिया जाता है, जो युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त करते हैं।
इतिहास में जाएं तो भगत सिंह के शहीद होने के दो दिन पहले कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। आचार्य कृपलानी की अध्यक्षता में हुए इस अधिवेशन में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। इसमें भगत सिंह को समर्थन न देने का निर्णय हुआ था। एक ही युवक ने ‘भगत सिंह जिंदाबाद’ का नारा लगाकर इसका विरोध किया था और वे थे सुभाषचंद्र बोस। कांग्रेस भगत सिंह, उधम सिंह या बोस जैसे क्रांतिकारियों की भावनाएं नहीं समझ सकी। अहिंसक व असहयोग वाले अपने आंदोलन के कारण उसने हिंसक प्रयासों का विरोध किया। दुनिया में हुई क्रांतियां यह बताती हैं कि केवल अहिंसक तरीकों से ही आजादी प्राप्त करना संभव नहीं होता।
क्रांति के हिमायती होने के बाद भी भगत सिंह व सुभाषचंद्र बोस के रुख में मतभेद था। क्रांतिकारी देश में ही रहकर अंग्रेजों से लड़ने के पक्ष में थे तो बोस देश के बाहर से सैन्य बल जुटाकर संघर्ष करने में विश्वास करते थे, जो उन्होंने किया भी। इसमें उन्हें कितनी सफलता मिलती, इस पर गहरे संदेह जताए गए हैं, क्योंकि जॉर्ज वाशिंगटन, ऑलिवर क्रॉमवेल, लेनिन या फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने कभी देश नहीं छोड़ा। जब लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारी चीन की क्रांति का अध्ययन करने वहां गए तो माओ त्से तंुग ने उनसे यही कहा कि वे अपने यहां उनकी नीतियों को आंख मूंदकर न अपनाएं। इस क्रांति की अच्छी बातें ग्रहण करें और लैटिन अमेरिका की समस्याओं के मुताबिक उन्हें लागू करें। उन्हें रूस या चीन से बिल्कुल अलग क्रांति की जरूरत है। भगत सिंह ने यही किया। उन्हें मालूम था कि उनके गंभीर प्रयासों से देशभर में ऐसी सैकड़ों गतिविधियां शुरू हो जाएंगी, जो बड़ी क्रांति का रूप ले लेंगी।
अब जब क्यूबा के क्रांतिकारी चे ग्वारा के साथ भगत सिंह की प्रतिमा लगाने की मुहिम चल रही है तो उन्हें औपचारिक रूप से शहीद घोषित कर भारत माता के इस सपूत के योगदान का सम्मान करना चाहिए। यह सही है कि भगत सिंह को औपचारिक रूप से शहीद घोषित किया गया तो देशभर से क्रांतिकारियों को शहीद का दर्जा देने की मांग उठने लगेगी, लेकिन उधम सिंह, खुदीराम बोस या सूर्या सेन जैसे क्रांतिकारियों को शहीद का दर्जा देने में हर्ज ही क्या है?
लेखक कोलकाता स्थित स्तंभकार हैं।
ranjandasgupta6@gmail.com