जम्मू कश्मीर की आपदा को एक लेख के दायरे में समेटना किसी त्रासदी से कम नहीं है। माहौल में भावनाएं हावी हैं और तर्कपूर्ण ढंग से सोचना कठिन है। हमने पहले भी प्राकृतिक आपदाएं देखी हैं। वे हमारे लिए नई नहीं हैं, लेकिन इस बार
जम्मू-कश्मीर में जो हुआ उसकी भूतकाल में कोई मिसाल नहीं मिलती। 10 लाख की आबादी वाली राजधानी का पानी में डूबना कोई सामान्य घटना नहीं है। फिर जब इसमें मकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, आधारभूत ढांचे का थोक में विनाश और बड़े पैमाने पर महामारी फैलने का खतरा हो तो लोगों में गुस्सा और हताशा पनपना स्वाभाविक है।
इस समय राहत और प्रशासन को दिशा देने में राज्य सरकार की अक्षमता के कारण गुस्सा और बढ़ गया है। यह तो हमेशा तैयार रहने वाली भारतीय सेना है, जो लोगों को उनकी दुश्वारियों से बाहर निकालने के प्रयासों में जुटी है। विडंबना है कि यह वही सेना है, जिस पर पृथकतावादियों और सीमा पार के उनके आकाओं के भड़काने पर तरह-तरह के लांछन लगाए गए थे। हालांकि, देशभर में सहानुभूति बढ़ने और मीडिया द्वारा
कश्मीर की दिल छू लेने वाली हकीकत को पेश करने के साथ सही सोच वाले लोगों को अहसास हुआ कि यह त्रासदी छोटी बातों, राजनीति या विभाजनकारी रवैये का वक्त नहीं है। वक्त राष्ट्र की एकजुटता, एकता और परिपक्वता दिखाने का है। ठीक यही इस खौफनाक त्रासदी के दौर में हो भी रहा है।
क्या
जम्मू-कश्मीर ऐसे विध्वंस के लिए तैयार था? जहां यह वक्त आरोप-प्रत्यारोप लगाने का नहीं है, वहीं भविष्य में आपदा-प्रबंधन संबंधी बहस के लिए जानकारी से लैस रहना हमारे लिए बेहतर होगा। जो जम्मू-कश्मीर को अच्छी तरह जानते हैं, उन्हें मालूम है कि यह पूरा क्षेत्र इकोलॉजी के हिसाब से आपदा की परीक्षा-भूमि है। असलियत यह है कि जो सतह पर दिखता है और साल-दर-साल जो साफ होता जाता है, उसकी ओर ही ध्यान जाता है। ध्यान में रखना होगा कि जम्मू क्षेत्र के निचले इलाके के पीर पंजाल और किश्तवाड़ रैंज में कई नदियां व नाले हैं, जिनमें बाढ़ आती रहती है। जहां तक जम्मू और इसके उपनगरों का सवाल है, इन नदियों की बाढ़ के प्रभाव को बेअसर करने की योजनाएं ऐतिहासिक रूप से उपलब्ध आकड़ों पर आधारित हैं और उन्हें हर साल अच्छी तरह अमल में लाया जाता है। इसी प्रकार लद्दाख में बादल फटने की घटनाएं आम हैं और प्रशासन व सेना ने इनसे निपटने की व्यवस्थित योजनाएं बना रखी हैं। हालांकि, घाटी में प्राकृतिक आपदाओं का ज्यादा संबंध हिमस्खलन, बर्फीले तूफान, सफेद सुनामी और भूकंप से रहा है। झेलम नदी कभी अपने किनारे तोड़कर बहने लगेगी, यह लोगों ने कभी सोचा नहीं था। इस बात के सबूत हैं कि कुछ साल पहले अध्ययन व शोध के नतीजों के आधार पर ऐसी आपदा की पूर्व चेतावनी दी गई थी, लेकिन आमतौर पर ऐसी रिपोर्टें प्रशासन के दफ्तरों में धूल खाती पाई जाती हैं। वजह यह होती है कि इन्हें अमल में लाने के लिए कड़े फैसले लेने होते हैं, जो लोकप्रिय नहीं होते। राजनीतिक नेता तो यही उम्मीद और प्रार्थना करते हैं कि उनके कार्यकाल में ये चेतावनियां हकीकत बनकर सामने न आएं। कश्मीर बाढ़ से निपटने के लिए तो पूरी तरह तैयार था, लेकिन जल-प्रलय से नहीं।
बाद में पूरी स्थिति का पोस्टमार्टम करने और यह देखने के लिए पूरा वक्त है कि श्रीनगर और इसके उपनगरों का पुनर्निर्माण किस प्रकार किया जाए और कैसे सामान्य जिंदगी फिर बहाल हो जाए। तात्कालिक चुनौती तो जरूरतमंदों को पूरी राहत पहुंचाने, फंसे लोगों को बचाने और सबसे बड़ी बात, महामारी की आशंका से निपटने की है। यह सब कैसे किया जाए यह बड़ा सवाल है, क्योंकि जिन लोगों को यह सब करना है वे खुद आपदा का शिकार हुए हैं। उनके घर तबाह हो गए हैं और परिवार बिखर गया है। क्रमबद्ध तरीके से काम नहीं किया जा सकता। सबकुछ एकसाथ ही करना होगा। प्राथमिकता संचार व्यवस्था की बहाली को देनी होगी, जो पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुकी हैं। इसके बिना अब भी जमीनी स्तर पर बचाव में लगे दलों के बीच तालमेल कायम किया जा सकेगा, न उन्हें कोई दिशा दी जा सकेगी और न उनका मार्गदर्शन ही संभव है। सबसे बड़ी बात, संचार के साधनों के बिना बिखरे परिवारों को एक साथ लाना मुमकिन नहीं है, जो बहुत ही परेशानी में हैं और घाटी से बाहर उनके संबंधी भी आशंकाओं की त्रासदी झेल रहे हैं। इस मानवीय पहलू पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा, क्योंकि परिवार एकजुट होने के बाद ही कश्मीरी नई जिंदगी शुरू करने के लिए उठ खड़े हो सकेंगे। केवल सेना ही नागरिक प्रशासन को मदद का श्रेष्ठतम उदाहरण पेश कर सकती है। किसी को भी देश की पेशेवर सेना, इसकी देशभक्ति और मदद करने की इच्छाशक्ति को लेकर आशंका नहीं होनी चाहिए।
स्वास्थ्य के खतरे अब सिर उठाने लगे हैं। हजारों पशु-पक्षी मारे गए हैं, जिनके शव हटाना और स्वास्थ्यकर तरीके से उन्हें ठिकाने लगाना भी एक बहुत बड़ा काम है। इसे मनरेगा और अन्य योजनाओं के तहत दोगुनी-तिगुनी मजदूरी देकर भी पूरा किया जाना चाहिए। इसके अलावा सेना ने अस्पताल की बड़ी सुविधाएं तो खड़ी की ही हैं, गैर-सरकारी संगठनों को चाहिए कि वे जगह-जगह छोटे स्तर पर ऐसी सुविधाएं जुटाएं। स्वास्थ्य मंत्रालय को स्थिति का जायजा लेकर देखना चाहिए कि किसी तरह के अभाव का सामना तो नहीं करना पड़ रहा है। अगर ऐसा है तो गैर-सरकारी संगठनों व अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मदद करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। रेड क्रॉस, यूनीसेफ और मेडिसिन सेन्स फ्रंटीयर जैसी संस्थाओं से मदद मांगने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। इसमें नीचा देखने जैसी कोई बात नहीं है। भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय का सम्माननीय सदस्य है और आपदा के समय अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मदद मांगने में कुछ भी गलत नहीं है।
सोशल मीिडया का जिक्र जरूरी है, जिसका प्रभाव बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दिनों में कुछ लोग राहत, बचाव और बिछड़े परिवारों के मिलाने के लिए मुकम्मल व्यवस्था कायम करने में कामयाब हुए हैं। ऐसी आपदाओं में सूचनाओं के प्रभावी संचार और काउंसिलिंग के लिए इस मीिडया की भूमिका का विश्लेषण होना चाहिए। शायद दंगों व हिंसा जैसी मानवकृत त्रासदियों में भी यह मीडिया बहुत उपयोगी साबित हो। अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। राहत और बचाव का काम िबना संगठन के हो रहा है, जो देश एकीकरण के लिए अच्छा है, लेकिन खतरा यह है कि जल्द ही कोई और चीज राष्ट्रीय मानस पर हावी हो जाएगी और यह त्रासदी भुला दी जाएगी। दस लाख लोगों का प्रभावित होना कोई साधारण बात नहीं है। वह भी ऐसे क्षेत्र में जहां राष्ट्र के प्रति असंतोष है। इस आपदा के प्रति राष्ट्र जिस तरह प्रतिसाद देता है, वही भविष्य की महत्वपूर्ण इबारत होगी।
लेफ्टि.जन. (रिटा.) सैयद अता हसनैन
श्रीनगर में सेना की 15वीं कोर के कमांडर रहे हैं
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