पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

क्या शाह खुद को बदल पाएंगे?

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
भारतीय मतदाताओं को राजनीति के पंडितों को चौंकाने की आदत है। कुछ हफ्ते पहले कहा जाता था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह कोई गलती नहीं कर सकते। अब उपचुनाव में उलटफेर की शृंखला के बाद इस जोड़ी पर जादुई स्पर्श गंवाने का आरोप लगाया जा रहा है, लेकिन न तो उन्हें लेकर अति-उत्साह और न कठोर आलोचना उचित है। कोई भी दो चुनाव एक जैसे नहीं होते और प्रत्येक चुनाव के बाद जो अतिवादी प्रतिक्रिया होती है, उसकी शायद जरूरत नहीं होती। बेशक, मोदी और शाह 2014 के चुनाव के स्टार राजनेता हैं और उपचुनाव के झटके केंद्र में पहली भाजपा सरकार लाने की बड़ी उपलब्धि से ध्यान नहीं बंटा सकते। इसके बावजूद सफलता किसी भी पार्टी को सुस्त यहां तक कि अहंकारी तक बना सकती है और भाजपा को यही सबक सीखने की कोशिश करनी चाहिए।
महाराष्ट्र में सीटों के बंटवारे के मसले पर भाजपा के व्यवहार को देखिए। 25 वर्षों से मूल केसरिया गठबंधन इस फॉर्मूले पर काम कर रहा है कि राज्य में भाजपा जूनियर पार्टनर है और शिवसेना प्रभावी ताकत। बाल ठाकरे हिंदू हृदय सम्राट थे और राज्य स्तरीय गठबंधन के मामलों में उनके शब्द अंतिम होते थे। अब भाजपा को लगता है कि लोकसभा चुनाव में उसकी शानदार जीत ने सत्ता संतुलन बदल दिया है। वह अधिक सीटें चाहती है और अपने मुख्यमंत्री की संभावना पर भी उसकी नजर टिकी है। हाल में अमित शाह जब मुंबई पहुंचे तो उद्धव ठाकरे को मुलाकात के लिए गुजारिश करनी पड़ी। जब बाल ठाकरे सेना सुप्रीमो थे तो ऐसी किसी स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती थी।
जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं उसके बाद के चार महीनों में भाजपा ने दृढ़तापूर्वक यह संदेश दिया है कि यह राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा (एनडीए) सरकार नहीं, भाजपा सरकार है। रामविलास पासवान जैसे सहयोगियों को ज्यादातर महत्वहीन मंत्रालय दिए गए, भारी उद्योग मंत्रालय देने पर शिवसेना के विरोध को नजरअंदाज कर दिया गया। तमिलनाडु के सहयोगी हाशिये पर डाल दिए गए। हरियाणा जनहित कांग्रेस को एक ओर फेंक दिया गया है और अकाली भी रुष्ट हैं।
एक अर्थ में भाजपा अपने 1998 के पूर्व अवतार में लौट रही है जब यह, अगर लालकृष्ण आडवाणी के स्मरणीय शब्दों में कहें तो ‘शानदार वैचारिक अलगाव’ की ओर बढ़ रही है। उस अलगाववादी स्थिति के कारण ही अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिनों के भीतर गिर गई थी। आडवाणी इतने चतुर थे कि उन्होंने पहचान लिया कि भाजपा का तात्कालिक भविष्य अन्य राजनीतिक दलों को साधकर गठबंधन बनाने में ही है। एनडीए का जन्म हुआ और वाजपेयी के वर्षों में एक स्तर पर इसमें 24 दल तक हो गए थे।
2014 के आम चुनाव में भाजपा ने सतर्क होकर छोटे दलों से गठबंधन मजबूत करने की रणनीति अपनाई। यहां तक कि अपना दल जैसे तुलनात्मक रूप से गौण दल को भी दो सीटों का लालच देकर लुभाया गया, जिसका पूर्वी उत्तरप्रदेश के छोटे से इलाके में मामूली अस्तित्व था। आखिर में एनडीए के साथ दर्जनभर से ज्यादा बड़ी-छोटी पार्टियां आ गई थीं। व्यापक गठबंधन से दो उद्‌देश्य हासिल हुए। एक तो इसे बढ़त दिलाने वाले वोट मिले (मसलन, अपना दल के पास वाराणसी-मिर्जापुर क्षेत्र में ठोस कुर्मी वोट थे)। दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह रही कि इससे मोदी को ‘राजनीतिक अस्पृश्यता’ से मुक्ति मिली। 2002 के गुजरात दंगों के बाद पासवान और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता मोदी के खिलाफ खुलकर बोले थे। अब उन्हें अपने साथ लेकर मोदी यह संदेश दे सके कि उनके विवादास्पद अतीत को असलियत में दफन कर दिया गया है।
हालांकि, चुनावी जीत के व्यापक पैमाने ने सारे समीकरण फिर एक बार बदल दिए हैं। अपने बल पर 282 सीटें जीतकर भाजपा खुद ही चकित रह गई। इससे उसे लगने लगा कि मोदी अपराजेय हैं और जीत किसी राजनीतिक गठबंधन की नहीं बल्कि व्यक्ति की है। कुछ हद तक यह सही भी है। 2014 के आम चुनाव में भाजपा की बड़ी सफलताओं में से एक यह रही कि वह मोदी के व्यक्तित्व के आस-पास राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली की शैली का जनमत संग्रह रच सकी। और इसके बाद भी जो केंद्र पर सफलतापूर्वक आजमाया गया हो, उसे हर राज्य में दोहराना बहुत कठिन होता है। शायद इसी कारण भाजपा ने अचानक उत्तरप्रदेश के उपचुनाव में अच्छे शासन का मुद्‌दा छोड़कर अधिक तीखे हिंदू एजेंडे पर जोर दिया। योगी आदित्यनाथ जैसे उग्र व्यक्तित्व को अपना स्टार प्रचारक बनाकर, लव जेहाद जैसा नकली मुद्‌दा उठाकर और हाशिये पर पड़ गए तत्वों को राजनीतिक मध्य में आने देने की अनुमति देकर भाजपा ने उस ब्रांड की राजनीति का प्रयोग किया, जिसे कई लोग मानते थे कि वह पीछे छोड़ चुकी है। जैसा कि उत्तरप्रदेश के उपचुनाव ने साबित किया, यह एक महंगी भूल थी।
उत्तरप्रदेश में आम चुनाव के विजयी प्रचार अभियान के मास्टर माइंड शाह को कुछ ठहरकर अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। जब वे यह जताते हैं कि जब तक सांप्रदायिक तनाव है, भाजपा को फायदा ही होगा तो वे धार्मिक ध्रुवीकरण का संकेत देते हैं, जो आसानी से पार्टी पर उलट सकता है। भारत का औसत मतदाता पहचान की राजनीति से ऊब चुका है और वह परंपरागत जाति और समुदाय के विभाजन से ऊपर उठने के राजनीतिक संदेश का इंतजार कर रहा है। आम चुनाव में ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ के नारे से रेखांकित हुए मोदी के उम्मीद जगाने वाले संदेश को बदलाव की आकांक्षा रखने वाले युवा ने अच्छा प्रतिसाद दिया। यह भारत लव जेहाद की कर्कश पुकार से आंदोलित नहीं होने वाला। वह तो नए युग की राजनीति के आधार में विकास का मजबूत एजेंडा देखना चाहता है। मोदी दिल्ली में तो यह भाषा बोलते हैं, लेकिन उनकी पार्टी की प्रदेश इकाइयां खासतौर पर उत्तरप्रदेश इकाई पुराने दौर से बाहर नहीं आ पा रही हैं। अल्पसंख्यक विरोधी अभियान पर घटते फायदों का नियम लागू होता है। यह मुस्लिमों को आशंकित और धर्मनिरपेक्ष हिंदू को विचलित करता है।
यही कारण है कि शाह को यह निर्णय जरूर लेना चाहिए कि वे भाजपा को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं : क्या वे गठबंधन की राजनीति त्यागकर अकेले चलने और विभाजनकारी वैचारिक एजेंडा आगे बढ़ाने में भरोसा करते हैं? या वे हिंदुत्व के परे देखने वाली समावेशी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहेंगे? मोदी ने विचारक से आगे जाकर प्रधानमंत्री के रूप में राजनयिक बनकर राह दिखाई है। क्या शाह भी अपना ऐसा रूपांतरण करने में सक्षम हैं?
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार
rajdeepsardesai52@gmail.com