सभी में आकर्षण होता है और हर आकर्षण की उम्र होती है। आकर्षण खत्म होने का सबसे ज्यादा खतरा पति-पत्नी के रिश्ते में होता है। अन्य रिश्तों में भी आकर्षण होता है। अनेक बार इसे बनाए रखना पड़ता है और कभी-कभी इसे खत्म भी करना पड़ता है। लगाव व आकर्षण में फर्क है। आकर्षण अनजान के प्रति खिंचाव है। लगाव जानबूझकर जुड़ना है। पति-पत्नी में धीरे-धीरे आकर्षण कम होने लगता है। रिश्ता प्रेम में बदल जाए ऐसा मुिश्कल से ही हो पाता है। प्रेम तो अनेक बार गुप्त समझौते जैसा बन जाता है। मन मारकर जीने की कला को प्रेम बता दिया जाए, तो लंबे समय शांति नहीं टिकी रह सकती। बागबानी में बोन्साई से पौधों में नवीन अाकार िदए जाते हैं। दांपत्य में प्रेम-भावना की बोन्साई करनी पड़ती है। नवीनता देनी पड़ती है। हर दिन नया करने-देखने की वृत्ति जब इस रिश्ते में आएगी तो इसका आकर्षण बना रहेगा, क्योंकि पति-पत्नी के रूप में एक-दूसरे से इतना गहन परिचय हो जाता है कि इसे घनिष्ठता की चरम सीमा भी कह सकते हैं। यहीं से शुरुआत होती है ऊब की, बेचैनी की। सही वक्त पर इलाज न हो तो इन्हें घुटन में बदलने में देर नहीं लगती। एक-दूसरे का अनादर आदत बन जाती है। साथ रहते हुए दूरियां बनने लगती है, इसलिए दांपत्य को नदी के रूप में देखा जाए। नदी की खूबी है बहना। चूंकि बहती है, इसलिए जल बदलता रहता है और इसीलिए नदी का आकर्षण बना रहता है। अपनी गृहस्थी में भी इस बहाव से आकर्षण निकालिए और आनंद उठाइए।
पं. विजयशंकर मेहता
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