हर काम को करने के कुछ कायदे होते हैं। योजना बनाकर किए काम में सफलता की संभावना रहती ही है, लेकिन योजना का वर्तमान जब एग्जीक्यूशन के भविष्य से जुड़ता है तो समझ की जरूरत पड़ती है। मैदान में योजना बनाने का वक्त नहीं होता। तुरंत निर्णय लेने होते हैं। इसमें हनुमानजी दक्ष थे, क्योंकि उनका मन उनके नियंत्रण में था। अनियंत्रित मन कई किस्म के विचार उछालकर अनिर्णय में डाल देगा। किष्किंधा कांड में हनुमानजी श्रीराम के सामने थे। पता लगाना था कि ये कौन हैं, ताकि सुग्रीव भविष्य का निर्णय ले सकें। हनुमानजी ने जब श्रीराम को देखा तो समझ गए कि यह कोई महान व्यक्तित्व हैं, इसीलिए उन्होंने परिचय प्राप्त करने के लिए बोली गई पंक्तियों में उनके लिए पूरी गरिमा रखी। ‘की तुम्ह तीनि देव महं कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।’ क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश इनमें से कोई हैं या आप दोनों नर और नारायण हैं। ‘जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।’ अथवा आप जगत् के मूल कारण और सम्पूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर से पार उतारने तथा पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया है। यह प्रसंग सिखाता है कि ऐसी स्थिति में वाणी का पूरे विवेक के साथ प्रयोग करें। आरंभ में आपके शब्द ही आपके व्यक्तित्व का परिचय देंगे। सामने वाले को पता लग जाएगा कि हम क्या हैं, क्योंकि हमारे प्रश्न गरिमामयी होंगे तो उत्तर भी सुलझे हुए आएंगे।
पं. विजयशंकर मेहता
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