किसी से जब हमारी पहली भेंट हो रही हो और सामने वाला व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली हो, तो हम दो तरह से रिएक्ट करते हैं। या तो हम स्वयं को कमजोर समझने लगते हैं या खुद को महान बताने लगते हैं। हनुमानजी, श्रीराम का परिचय पूछते हुए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिनसे श्रीराम का मान बढ़े। यही हमें सीखना है। किष्किंधा कांड में हनुमानजी के प्रश्नों को तुलसीदासजी ने ऐसे लिखा है : जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।। आप जगत् के मूल कारण और सपूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर से पार उतारने तथा पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया है। ये शब्द सुनकर श्रीराम ने लक्ष्मण से टिप्पणी की थी, जिसकी चर्चा वाल्मीकि रामायण में आई है। नानृग्वेद विनीतस्य नायजुर्वेदधारिण:। नासामवेदविदुष: शक्यमेवं विभाषितुम।। जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान नहीं है, वह ऐसी सुंदर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता। एवविधो यस्य दूतो न भवेत् पार्थिवस्य तु। सिद्धयंति हि कथं तस्य कार्याणां गतयोअनघ।। जिस राजा के पास ऐसे दूत न हो, उसके कार्यों की सिद्धि कैसे हो सकती है। मतलब यह कि आपके शब्द आपको अच्छे लोगों से ऐसे जोड़ देंगे कि आपका भविष्य सफल-सुरक्षित हो जाएगा, इसलिए शब्दों को बहुमूल्य सिक्कों की तरह सावधानी से खर्च किया जाए।
पं. विजयशंकर मेहता
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