आजकल सभी ने छोटी-बड़ी पद-प्रतिष्ठा हासिल कर ली। लोग कुख्याति को भी लोकप्रियता मान रहे हैं। जिसे देखो वो ऊंचा उठने के चक्कर में है और इसीलिए अधिकांश लोगों के आस-पास या तो उनके अधीनस्थ हैं या उनके आदेश पर काम करने वाले कर्मचारी। हम अधीनस्थों को आदेश देने के इतने आदी हो जाते हैं कि जो काम व्यक्तिगत रूप से हमें करने चाहिए हम उनके लिए भी दूसरे के हाथ-पैरों पर टिक जाते हैं और इसीलिए जब हम शांति की खोज में निकलते हैं तो हमारी यही डिपेंडेंसी बाधा बन जाती है। दूसरों को निर्देश देना वैसे भी आसान है, पर क्या हमने सोचा है कि हम खुद को आज्ञा दे सकते हैं। अगर आप शांति चाहते हैं तो कम से कम रात को सोने से पहले खुद को आदेश देने का स्वभाव बना लें। उस समय हमारा अवचेतन मन आज्ञा लेने के लिए पूरी तरह से तैयार रहता है। जरा खुद को डांटकर कहिए कि बाहर का संसार बिल्कुल अंदर नहीं जाएगा। अब वैसे ही शयन में हम और हमारी आत्मा होगी। कल का दिन है दूसरों के साथ बिताने के लिए। देखिए, यह केवल समझाने से नहीं होगा, इसमें खुद को डांटना ही पड़ेगा। आसमान और बादल दो अलग-अलग बातें हैं। इसी तरह मन और विचार भी अलग-अलग बातें हैं। सोने के पहले मन के आकाश से विचारों के बादल हटा दीजिए। बादलों की नियति है बहना और आकाश ठहरा ही रहेगा। यह काम अपने आप को डांटकर ही किया जा सकेगा। शांत होकर सोना जीवन की बड़ी उपलब्धि है।
पं. विजयशंकर मेहता
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