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गरबा व्यक्तित्व का नहीं, अस्तित्व का उत्सव

7 वर्ष पहले
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एक ही मामले में विज्ञान और धर्म सहमत हो जाते हैं और वह है शक्ति। धर्म जीवन ढूंढ़ता है और विज्ञान जीवन के कारण खोजता है। विज्ञान वस्तुओं को इतना उघाड़ता है कि उसका मूल स्वरूप ही समाप्त हो जाता है, जबकि धर्म विकृत को भी सुंदर बना देता हैै। विज्ञान की सारी खोज शक्ति के आस-पास है और परमात्मा ने भी समस्त क्रियाएं शक्ति के माध्यम से संचालित की हैं। वैसे तो तीन सौ पैंसठ दिन शक्ति मनुष्य के शरीर में बहती रहती है, लेकिन परमात्मा ने उसके ज्ञान के लिए नौ दिन विशेष रूप से तय किए हैं, जिन्हें नवराित्र कहा जाता है। परमात्मा के इस आदेश को ऋषि-मुनियों ने बहुत ही सुंदर ढंग से उत्सव बना डाला। ध्यान रखें, उत्सव व्यक्तित्व का काम नहीं है, अस्तित्व का काम है। जैसे इन दिनों जो गरबा होंगे उसमें व्यक्तित्व नाचेगा, यानी शरीर की थिरकन होगी, पर केवल ऐसा ही होगा तो समझ लें मौज-मस्ती का मामला रह गया। जैसे ही जप-तप-उपवास से जुड़ेंगे यह बात अस्तित्व की हो जाएगी। गरबे में जब व्यक्तित्व के साथ अस्तित्व जुड़ जाए, तब यह सचमुच देवी के सामने किया हुआ नर्तन होगा। हर गरबा करने वाले को यह बात अपने अंतरमन में रखनी चाहिए कि जब पहली बार उसने चलना सीखा हो तब लड़खड़ाते पैरों के साथ चलते हुए देख हमारी मां ने दोनों हाथ फैलाकर हमें पुकारा होगा और हम हिलते-डुलते उसकी बाहों में समा गए होंगे। उस समय हम बच्चे थे तो शायद हमें यह अनुभूति नहीं हुई होगी कि मां कितनी खुश रही होगी, लेकिन आज गरबा करते समय आप मां दुर्गा की इस प्रसन्नता और कृपा की अनुभूति कर सकेंगे।
पं. विजयशंकर मेहता
humarehanuman@gmail.com
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