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अपने विश्वास से बनता है व्यक्तित्व

7 वर्ष पहले
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हमने जीवन में जो कुछ भी पिछले समय में किया है, पाया है, खोया है वह सब इकट्‌ठा होकर हमारा विश्वास बन जाता है। फिर अपने बारे में जो विश्वास हमारा होता है, वैसे ही हम होने लगते हैं। यदि हमने घोर संघर्ष किया है और हम सफल हो गए, तो हमें अपने भीतर का लौह पुरुष प्रिय हो जाता है। हमें भरोसा होने लगता है कि हम कुछ भी कर सकते हैं। जब इसका उल्टा होता है, हम असफल हो चुके होते हैं, तो फिर हमारे भीतर बैठा कमजोर इंसान कहता है हमसे कुछ नहीं हो सकेगा। हम अपनी ही कमजोरियों की मिट्‌टी से अपने व्यक्तित्व की प्रतिमा गढ़ लेते हैं। कठिन और सरल समय में मनुष्य सबसे अच्छा बनता है, इसलिए अपने जीवन में जब कठिन समय आए उस हर दिन को पाठशाला मानकर बिताइए। जब सरल समय आए तो आनंद-वन की तरह मान लें, क्योंकि यह जो मानना है इससे हमारा व्यक्तित्व बनेगा। इन दोनों स्थितियों में जागरूक रहिए, क्योंकि यह हमारे निर्माण का वक्त रहेगा। जब कठिन समय आए तो अपने आप को थोड़ा लचीला बनाएं। यदि आप कड़क हो जाएंगे, तो आपको चोट भी ज्यादा लगेगी। इन स्थितियों में मन बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह आपको अस्थिर करता है और फिर आप परेशान होकर ऐसे काम करने लगते हैं जो खुद को भी समझ में नहीं आते, इसलिए मन पर बराबर काम करते रहिए। मन के पास बीते हुए का बड़ा स्टॉक होता है। जो काम का है वह रखें और बाकी को डिलीट कर दें। जो बचेगा वही हमारा सही व्यक्तित्व होगा।
पं. विजयशंकर मेहता
humarehanuman@gmail.com
web:hamarehanuman.com