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परहित कर ब्राह्मण ने पाया मोक्ष

7 वर्ष पहले
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एक ब्राह्मण निर्धन होने के बावजूद अत्यंत उदार था। वह हवन-यज्ञादि कर्मों से जो भी प्राप्त करता, उसे असहायों में बांट देता। एक बार ब्राह्मण किसी सेठ के यहां हवन कराने गया। हवन के बाद सेठ ने ब्राह्मण को अनेक पकवानों से सज्जित थाली पर भोजन हेतु बैठाया। ब्राह्मण ने सोचा कि इससे तो कम से कम तीन निर्धनों की भूख मिटाई जा सकती है। उसने सेठ से अाग्रह किया कि वह उस भोजन को घर जाकर ग्रहण करेगा। ब्राह्मण जब वह भोजन लेकर बाहर आया तो रास्ते में जो भी भूखा मिला, उसे उसने भरपेट खिलाया। अंत में जो कुछ बचा, उसे ब्राह्मण अपनी कुटिया में लेकर आया और खाने बैठा। तभी एक भिक्षुक द्वार पर आ खड़ा हुआ। ब्राह्मण ने थाली में कुछ चीजें उसे दे दीं। फिर एक विकलांग आकर भोजन मांगने लगा। ब्राह्मण ने उसे भी कुछ पकवान दे दिए। फिर जैसे ही वह पहला कौर मंुह में डालने को हुआ कि एक वृद्ध वहां आया और तीन दिन से भूखा होने की बात कहकर कुछ खाने को मांगा। ब्राह्मण ने दया करके उसे पूरी थाली उठाकर दे दी। इतने सारे लोगों को भोजन कराने की तृिप्त मन में लेकर ब्राह्मण ने सोचा कि पानी पीकर अपनी भूख शांत कर ले। जैसे ही उसने पानी के बर्तन में लोटा डाला कि गर्मी से बेहाल एक कुत्ता वहां आया। ब्राह्मण ने पानी का बर्तन उसके सामने रख दिया। कुत्ता पूरा पानी पी गया। भूखा-प्यासा होने के बावजूद ब्राह्मण की आत्मा में परम संतोष था। तभी वहां भगवान शिव प्रकट हुए और ब्राह्मण को बताया कि भिक्षुक, विकलांग, वृद्ध और कुत्ते के रूप में वे ही आए थे। ब्राह्मण को उन्होंने मोक्ष दिया और वह धन्य हो गया। वस्तुत: परहित को सर्वोपरि रखने वाला कभी अभावग्रस्त नहीं होता, उसकी आत्मा दिव्य आनंद से सदा समृद्ध रहती है।