धन्ना सेठ के पास सात पुश्तों के पालन-पोषण जितना धन था। उसका व्यापार चारों तरफ फैला हुआ था, किंतु फिर भी उसका मन अशांत रहता था। कभी धन की सुरक्षा की चिंता, तो कभी व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा में आगे निकलने का तनाव। चिंता और तनाव के कारण वह अस्वस्थ रहने लगा। उसके मित्र ने उसकी गिरती दशा एक देखी, तो उसे एक साधु के आश्रम में जाने की सलाह दी। सेठ साधु के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताई। साधु ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, ‘तुम घबराओ मत। तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर होगा। बस, तुम यहां कुछ दिन रहकर प्रभु का ध्यान किया करो।’ साधु के कहे अनुसार सेठ ने रोज ध्यान करना शुरू कर दिया, किंतु सेठ का मन ध्यान में नहीं लगा। वह जैसे ही ध्यान करने बैठता, उसका मन फिर अपनी दुनिया में चला जाता। उसने साधु को यह बात बताई, किंतु साधु ने कोई उपाय नहीं बताया। थोड़ी देर बाद जब सेठ साधु के साथ आश्रम के पास के वन में सायंकालीन भ्रमण कर रहा था, तो उसके पैर में एक कांटा चुभ गया। वह दर्द के मारे कराहने लगा। साधु ने कहा, ‘बेहतर होगा कि तुम जी कड़ा कर कांटे को निकाल दो, तब इस दर्द से मुक्ति मिल जाएगी।’ सेठ ने मन कड़ा कर कांटा निकाल दिया। उसे चैन मिल गया। तब साधु ने उसे समझाया, ‘ऐसे ही लोभ, मोह, क्रोध, घमंड व द्वेष के कांटे तुम्हारे मन में गड़े हैं। जब तक अपने मन की संकल्प शक्ति से उन्हें नहीं निकालोगे, अशांत ही रहोगे।’ सेठ का अज्ञान साधु के इन शब्दों से दूर हो गया और उसने निर्मल हृदय की राह पकड़ ली। अपनी कुप्रवृत्तियों से मुक्ति के लिए संकल्पबद्धता अनिवार्य है। जब तक व्यक्ति दृढ़-निश्चय न कर ले, वह अपनी गलत आदतों से मुक्त नहीं हो सकता।