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धैर्य व हुनर से बसाई उजड़ी गृहस्थी

7 वर्ष पहले
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कुशावती नगर में राजा ओक्काक की रानी शीलवती ने देवराज इंद्र के वरदान से एक कुरूप, किंतु बुद्धिमान और दूसरे सुंदर किंतु मूर्ख पुत्र को जन्म दिया। पहले का नाम रखा गया कुश और दूसरे का जयमपति। बड़े होने के साथ कुश को महसूस हुआ कि उसकी कुरूपता उसकी उपेक्षा का कारण बन सकती है, इसलिए उसने संगीत, मूिर्तकला, चित्रकला, पाक कला और युद्ध कौशल सीखकर अपने दोष को नगण्य बना दिया, लेकिन विवाह के यक्ष प्रश्न पर राजा और रानी बहुत चिंतित थे। ऐसे कुरूप से भला कौन सी कन्या विवाह करना पसंद करेगी? अंतत: उन्होंने मद्र देश की राजकुमारी प्रभावती के लिए कुश का रिश्ता यह घोषणा करते हुए भेजा कि कुश ही राज्य का अगला उत्तराधिकारी बनेगा और परंपरा का कारण बताकर कहा कि जब तक प्रभावती की गोद न भर जाए, वह कुश का मुंह नहीं देखेगी। विवाह संपन्न हो गया और अंधेरे कक्ष में शीलवती ने पुत्र तथा बहू की भेंट कराई। एक दिन प्रभावती को किसी दासी ने कुश के विषय में पूरा सच बताया, तो वह नाराज होकर अपने मायके चली गई। कुछ दिन बाद पत्नी वियोग में दु:खी कुश मद्र देश पहुंचा और राजमहल में रसोइये का काम करने लगा। तभी एक दिन मद्र नरेश को सूचना मिली कि उनकी अप्सरा जैसी बेटी के लिए सात राजा मिलकर उन पर आक्रमण करने आ रहे हैं। तब साहसी कुश ने अपना असली परिचय देते हुए सातों राजाओं को परास्त किया। प्रभावती अपने पति के साहस और समर्पण पर मुग्ध हो गई और उसके साथ पुन: कुशावती लौट आई। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और हुनर बहुत काम आते हैं, इसलिए प्रयास करें कि प्रतिकूलताओं में विचलित न हों और कम से कम एक कला या हुनर अवश्य सीखें।