कई दिनों की पैदल यात्रा से थककर वह वृक्ष के नीचे सुस्ताने बैठा। गर्मी के दिन थे। कंठ सूख रहा था, किंतु वहां कोई कुआं, तालाब या नदी नजर नहीं आ रहे थे। उसने मन में सोचा कि अच्छा हो यदि पीने के लिए शीतल जल मिल जाए। सोचते ही लोटे में जल आ गया। वह हैरान हो गया। फिर जी भरकर पानी पीया और लेट गया। थोड़ी देर बाद उसे भूख लगी। पास का चना-चबेना खत्म हो गया था। उसने सोचा कि काश मेरे लिए यहां स्वादिष्ट भोजन आ जाए। उसके इतना सोचते ही सामने विविध व्यंजनों वाला स्वादिष्ट भोजन आ गया। उसने छककर भोजन किया। भोजन करने के बाद उसने सोचा कि इस घने जंगल में मेरे सोचने मात्र से भोजन-पानी की व्यवस्था कैसे हो गई? कहीं यहां भूत-प्रेत का वास तो नहीं? यदि इस समय इस निर्जन वन में भूत आकर मुझे खा जाए तो? यह सोचकर वह भयभीत हो गया। उसके ऐसा सोचते ही वहां एक भूत आया और उसने उसे खाने की इच्छा प्रकट की। वह व्यक्ति डर के मारे कांपने लगा। फिर उसने पूरा साहस जुटाकर मन मजबूत कर सोचा कि भूत-प्रेत कुछ नहीं होते और मैं किसी से नहीं डरता। उसके ऐसा सोचते ही भूत गायब हो गया। कहते हैं कि वह व्यक्ति कल्पवृक्ष के नीचे बैठा था, जिसके नीचे बैठकर जो इच्छा की जाए, वह पूर्ण हो जाती है, किंतु यह सिर्फ एक काल्पनिक कथा है, जिसका िनहितार्थ यह है कि किसी इच्छा की पूर्णता के लिए पहले मन में उस इच्छा का होना जरूरी है। इच्छा के होने पर कर्म संभव होता है और कर्म से अपेक्षित फल की प्राप्ति होती है। वस्तुत: यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक कल्पवृक्ष है, जो हमारी इच्छा और भाव के अनुरूप हमारी सृष्टि का निर्माण करता है। सकारात्मक भावों के द्वारा इसे सार्थक रूप दिया जा सकता है।