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जब स्वामी रामतीर्थ बने सच्चे जितेंद्रिय

7 वर्ष पहले
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स्वामी रामतीर्थ के जीवन का प्रसंग है। स्वामीजी संन्यास के पथ पर थे। वे लगभग अासक्ति रहित जीवन जी रहे थे, किंतु एक बिंदु पर वे स्वयं को दुर्बल पाते थे। वस्तुत: उन्हें कुछ फल अत्यधिक प्रिय थे। जब वे गहन चिंतन की अवस्था में हाेते थे, तब भी अनेक बार उनका ध्यान उन फलों की ओर चला जाता था। चूंकि शिष्यों को भी उनकी पसंद पता थी, इसलिए उनके खाने के लिए वे उन्हीं फलों को उनके समक्ष रख देते थे। अत: स्वामीजी का ध्यान भटक जाता था। स्वामीजी काफी प्रयास करने के बाद भी फलों से खुद को दूर नहीं रख पा रहे थे। अपनी इस दुर्बलता को दूर करने के उपायों पर स्वामीजी ने स्वयं ही चिंतन-मनन किया। अंतत: उन्हें उपाय सूझ गया। उन्होंने सभी प्रिय फलों को मंगवाकर अपने सामने रख दिया। अब उनकी दृष्टि लगातार उन फलों पर रहती। मन भी बार-बार उन फलों की ओर आकर्षित होता और वे उसे फिर-फिर चिंतन की ओर ले जाते। कुछ दिनों तक यह मानसिक द्वंंद्व चलता रहा, लेकिन स्वामीजी फल न खाने में सफल हो गए। इससे उनकी संकल्प शक्ति अत्यधिक बढ़ गई। अंतत: वे सभी फल सड़ गए और उनका स्वाद बिगड़ गया। तब स्वामीजी ने उन फलों को फिंकवा दिया। इससे उनके मन पर जीवन की क्षण भंगुरता और निस्सारता स्पष्ट होकर गहराई तक बैठ गई। इस प्रकार स्वामी रामतीर्थ की फलों के प्रति आसक्ति सदा के लिए समाप्त हो गई। संन्यास वास्तविक अर्थों में तभी घटता है, जब मन स्थिर और एकाग्र हो। विचलित मन आशा और तृष्णा में रत रहता है, जबकि स्थिर मन इनसे मुक्त रहता है। अत: संन्यासी को अपने मन को सांसारिक प्रपंचों से दूर रखने का प्रयास करना चाहिए।