जहां प्रसन्नता है विकास का अनूठा पैमाना / जहां प्रसन्नता है विकास का अनूठा पैमाना

गूगल में ‘भूटान’ टाइप करें और स्क्रीन पर इस आशय के सैकड़ों लेख आ जाएंगे, ‘ऐसी बादशाहत खोजें, जहां खुशी का साम्राज्य है।’

क्लॉड अार्पी

Jul 18, 2016, 02:31 AM IST
जहां प्रसन्नता है विकास का अनूठा पैमाना
गूगल में ‘भूटान’ टाइप करें और स्क्रीन पर इस आशय के सैकड़ों लेख आ जाएंगे, ‘ऐसी बादशाहत खोजें, जहां खुशी का साम्राज्य है।’ ‘किंगडम ऑफ ड्रेगन’ आज धरती का सबसे प्रसन्न और संतुष्ट देश माना जाता है। किंतु खुशी, प्रसन्नता है क्या? विकिपीडिया कहता है, ‘प्रसन्नता अच्छा लगने की मानसिक या भावनात्मक अवस्था है, जिसे संतुष्टी से लेकर तीव्र उल्लास तक की कई सकारात्मक या खुशनुमा भावनाओं से परिभाषित किया जाता है।’ बात यह है कि कोई परिभाषा बच्चे के चेहरे की मुस्कान की जगह नहीं ले सकती, नि:संदेह खुशी परिभाषा के परे है। आकार में छोटे से राष्ट्र ने पूरी दुनिया को ‘वैश्विक प्रसन्नता’ से परिचित करा दिया। सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता (ग्रॉस नेशनल हैपीनेस, जीएनएच) की अवधारणा 1972 में भूटान के चौथे राजा जेश्मे सिंग्ये वांगचुक ने गढ़ी थी। यह सही है कि सदियों से भूटान की संस्कृति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वाले भौतिक विकास की बजाय जीवन की गहरी समझ पर आधारित रही है।

यह एक ऐसे सम्राट की प्रतिभा का चमत्कार था, जिसने शायद भविष्य को देख लिया था। जब थिम्पु ने भूटान की संतोष की संस्कृति को संरक्षण देने वाली अर्थव्यवस्था विकसित करने का संकल्प लिया तो उस वक्त प्रसन्नता, खुशी, संतोष जैसी बातें चलन में नहीं थीं। हिमालय की गोद में बैठे इस राष्ट्र को अब प्राय: अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में उद्‌धृत किया जाता है। भूटान सांसारिक खबरों में भी रहता है और वह भी सही कारणों से। कैम्ब्रिज के ड्यूक व डचेस प्रसन्नता की इस धरती पर आए थे और उन्होंने दर्शनीय टाइगर लायर तक ट्रेकिंग भी की। टाइगर लायर को भूटान की भाषा ‘जोंगका’ में पारो तक्तसंग भी कहते हैं। मठों का यह संकुल ऊपर पारो घाटी में एक कगार पर झूलता-सा प्रतीत होता है। इसे 17वीं सदी में बनाया गया था और जहां स्वात में जन्मे गुरु पद्‌मसंभव ने तीन साल, तीन माह और तीन दिन तक ध्यान किया था। पारो तक्तसंग उन 13 तक्तसंग गुफाओं में से एक है, जिनपर सर्वोच्च आनंद के देवता ने अपनी कृपा की है।

क्या दुनिया खुशी को समझ पाती है? कुछ सप्ताह पहले संयुक्त राष्ट्र द्वारा 156 देशों के लोगों से जुटाए आंकड़ों में आश्चर्यजनक ढंग से भूटान को खुश राष्ट्रों की सूची में बहुत नीचे, चीन से एक स्थान नीचे 84वां स्थान दिया गया। इसमें अलग पैमानों का इस्तेमाल किया गया : प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी, सामाजिक सुरक्षा, स्वस्थ जीवन जीने की अवधि, जीवन के चुनाव करने की स्वतंत्रता, उदारता अौर भ्रष्टाचार को लेकर धारणा। सूची के शीर्ष पांच देशों में डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड, नार्वे और फिनलैंड का शामिल होना बताता है कि प्रसन्नता जांचने के पैमाने पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है। यह बड़े दुख की बात है! भारत को 118वां स्थान मिला है?

प्रत्येक देश की तुलना डिस्टोपिया से की गई है। यह एक काल्पनिक राष्ट्र है जहां मानवीय दुश्वारियां, दमन, बीमारियां, जरूरत से ज्यादा आबादी और भय का साम्राज्य है। ऐसी जगह जहां सबकुछ गलत ही है। डिस्टोपिया, यूटोपिया का उल्टा है, जो आदर्श समाज का पर्याय है, जिसमें न अपराध है और न गरीबी। पश्चिमी पूर्वग्रह (अथवा समझ की कमी) के बावजूद यह देखना रोचक है कि संयुक्त राष्ट्र ने ‘प्रसन्नता’ की अवधारणा का अध्ययन शुरू किया है, जो भारतीय और हिमालयीन संस्कृति के केंद्र में मौजूद है।

खुशनुमा वातावरण : भूटान के प्रधानमंत्री त्शेरिंग टॉब्गे ने कनाडा के वेंकुवर में बहुत ही प्रेरणादायक टेड टॉक यानी प्रेरणादायी वीडियो वार्ता दी। वे लैंड ऑफ ड्रेगन की विशेष संस्कृति, सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता की इसकी अवधारणा, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और सबको मुफ्त शिक्षा पर धाराप्रवाह बोले। उन्होंने कहा, ‘ दुनिया में जो 200 प्लस देश हैं, ऐसा लगता है कि उनमें केवल हम ही हैं, जो कार्बन न्यूट्रल हैं यानी अतिरिक्त कार्बन पैदा नहीं कर रहे हैं। वास्तव में ऐसा कहना भी एकदम ठीक नहीं है, क्योंकि भूटान कार्बन न्यूट्रल ही नहीं, कार्बन निगेटिव है।’ ‘हैपी’ प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा, ‘हमारी कार्बन न्यूट्रल रणनीति के केंद्र में हैं हमारे संरक्षित क्षेत्र। ये लगातार कार्बन हटाते रहते हैं। वे हमारे फेफड़े हैं। आज आधे से ज्यादा हमारा देश राष्ट्रीय उद्यानों, राष्ट्रीय संरक्षित क्षेत्र और वन्यजीव अभयारण्यों के रूप में संरक्षित है।’

प्रसन्नता के स्तंभ : भूटान ने ‘प्रसन्नता’ के चार स्तंभ बताए हैं। टिकाऊ विकास, सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण और उन्हें प्रोत्साहन, प्राकृतिक पर्यावरण को संरक्षण और अच्छे शासन की स्थापना। डीएनएच आधिकारिक रूप से भूटान की पंचवर्षीय योजना प्रक्रिया का हिस्सा है, जो देश के आर्थिक विकास का मार्गदर्शन करती है।

अब जब दुनिया मुड़कर पीछे की गई गड़बड़ को देख रही है तो कई लोगों को लग रहा है कि जीएनएच शायद इतनी नादानी की बात भी नहीं है। पेरिस कॉन्फ्रेंस के अंत में यूरोपीय संघ ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की भूटान की ‘असाधारण महत्वाकांक्षा’ को सम्मान दिया। प्रसन्नता अब यूटोपिया नहीं है, भूटान को प्राय: अनुकरणीय उदाहरण के रूप में उद्‌धृत किया जाता है।

क्या भूटान के धनी होते जाने के साथ ‘प्रसन्नता’ को और अधिक संपदा के लिए पृष्ठभूमि में डाल दिया जाएगा? यदि रिपोर्टों पर भरोसा करें तो जल्द ही लैंड ऑफ ड्रैगन पर बांध बनाने वाली कंपनियों का राज होगा। जब ‘विकास’ ही वैश्विक देवता है तो क्या समाज ‘प्रसन्न’ रह सकता है? अब यह सब भूटान पर निर्भर है, लेकिन महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ‘प्रसन्नता’ की अवधारणा पूरी दुनिया में स्वीकार की गई है। टोब्गे ने कहा, ‘जैविक गलियारों से जानवर पूरे देश में घूमने के लिए स्वतंत्र हैं।’ वहां दुनिया में सबसे ज्यादा व्हाइट बैलिड हेरन (बगुले की खास किस्म) है। इसे एक अंतरराष्ट्रीय वर्कशॉप में स्वीकार किया गया। रॉयल सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ नेचर ने हेरन के संरक्षण पर यह वर्कशॉप की थी। अब भूटान में दुनिया के 47 फीसदी हेरन पाए जाते हैं। पहले यह 14 फीसदी थे।

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि पद्‌मसंभव संयुक्त राष्ट्र के पैमाने पर कहां ठहरते। उन्हें सामाजिक सुरक्षा नहीं थी, उनके पास वाई-फाई नहीं था, परिवहन के साधन (आकाश गमन के अलावा) नहीं थे, कोई घर नहीं था (हालांकि तक्तसंग से अद्‌भुत सुंदर नज़ारे दिखते हैं), लेकिन उनकी गुफा आज भी प्रसन्नता से आवेशित है। क्या यह खुशी टिकेगी, यह एक अलग सवाल है।

क्लॉड अार्पी
फ्रांस में जन्मे भारत में बसे पत्रकार, इतिहासकार और तिब्बत विशेषज्ञ
claude@auroville.org.in
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