ईमानदार व्यवस्था के लिए बहुत कुछ करना होगा

5 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
नोटबंदी से जनता को हुई परेशानी के बीच व्यवस्था के ताकतवर लोगों पर कार्रवाई और दिखावटी राजनीतिक दलों को आयकर नोटिस दिए जाने के सुझाव में एक उम्मीद जरूर दिखाई पड़ रही है लेकिन, उससे कोई बहुत बड़ी संभावना नहीं बनती। इन कार्रवाइयों को नोटबंदी को सही साबित करने के लिए पेश किया जाना पूरी तरह से तार्किक इसलिए नहीं बैठता, क्योंकि ये बिना नोटबंदी के भी की जा सकती थीं।
तमिलनाडु के मुख्य सचिव राममोहन राव से आयकर वालों की पूछताछ और चुनाव आयोग की तरफ से उन दो सौ पार्टियों को आयकर नोटिस दिए जाने का सुझाव जो चुनाव लड़े बिना ही चंदा बटोरती रहती हैं, भ्रष्टाचार मिटाने की दिशा में अच्छे कदम हैं। किंतु इन कदमों के लिए मौजूदा माहौल बनाने का औचित्य समझ में नहीं आता। तमिलनाडु के मुख्य सचिव तक आयकर विभाग के हाथ तब पहुंचे हैं जब उनके मोहल्ले में ही श्रीनिवास रेड्‌डी और शेखर रेड्‌डी के घर से 136 करोड़ रुपए की नकदी और 177 किलो सोना बरामद हुआ। रेड्‌डी बंधुओं ने राममोहन राव का नाम लिया इसलिए वे संदेह के घेरे में आ गए। चर्चा के बावजूद इस मामले में किसी राजनेता का नाम नहीं आया है, जबकि मई 2016 में सत्ता में आने के बाद जयललिता ने अपने भरोसेमंद अधिकारी के तौर पर राममोहन राव की नियुक्ति की थी। अगर जयललिता की कार्यप्रणाली संदेहास्पद रही है तो निधन के बाद उनकी उत्तराधिकारी बन रही शशिकला भी कम विवादास्पद नहीं रही हैं। आज फिर तमिलनाडु की सत्ता के इर्द-गिर्द वे ही हावी हैं।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने जिन 200 कारोबारी पार्टियों को आयकर का नोटिस भेजने का सुझाव दिया है उन्हें इसी एनडीए सरकार ने विदेशी चंदा लेने की कानूनी छूट प्रदान की थी। एक बात बहुत ध्यान से समझ लेनी चाहिए कि भ्रष्टाचार न तो चुनाव जीतने के उद्‌देश्य से की जाने वाली बाजीगारी से दूर होने वाला है और न ही कुछ छापामार लड़ाइयों से। यह लंबी बीमारी है, जिसके पीछे संपू्र्ण व्यवस्था का किसी न किसी स्तर पर सहयोग रहता है। यह लड़ाई नई संस्थाएं बनाने, नई राजनीतिक संस्कृति विकसित करने और नागरिकों में नए किस्म की जिम्मेदारी और सुरक्षा पैदा करने से जीती जा सकेगी। महज सनसनी और भय से हासिल की जाने वाली जीत स्थायी नहीं होती।
खबरें और भी हैं...