सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के बाद गरमाएगा मंदिर मुद्‌दा

6 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
भारतीय लोकतंत्र हिंदुत्व की योजना में उलझ गया है और उसके प्रमाण बार-बार उपस्थित हो रहे हैं। सबसे ताजा प्रमाण सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी है कि राम मंदिर का विवाद दोनों पक्ष अदालत के बाहर बैठकर सुलझाएं और वे इसमें मदद करेंगे। उन्होंने इसके लिए 31 मार्च तक का समय भी दिया है।
 
अदालत की यह टिप्पणी भाजपा नेता और याचिकाकर्ता सुब्रह्मण्यम स्वामी के माध्यम से सामने आई है और इसका अयोध्या आंदोलन के सभी समर्थकों ने स्वागत किया है, जिनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल है। किंतु अदालत के सुझाव पर मुस्लिम समुदाय विभाजित है। जहां ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रतिनिधि जफरयाब जिलानी ने कहा है कि उन्हें अदालत से बाहर होने वाला समझौता मंजूर नहीं है, वहीं जामा मस्जिद के इमाम मौलाना अहमद बुखारी ने अदालत से बाहर पहल का स्वागत किया है लेकिन, मामला इतना ही नहीं है।
 
अदालत की इस टिप्पणी के साथ यह कहने का सिलसिला बढ़ गया है कि अयोध्या में राम मंदिर था। बल्कि सुब्रहमण्यम स्वामी ने तो यहां तक कहा है कि अगर मस्जिद बनाई जानी है तो उसे सरयू के उस पार बनाया जाना चाहिए। इस पूरी बहस में सबसे बड़ी बात सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का यह कहना है कि मामला धर्म और आस्था का है। इससे इस विवाद में न तो इतिहास का प्रश्न कहीं बचता है और न ही कानून के तहत तय होने वाले मालिकाना हक का। इससे लगता है कि कानून के लिहाज से काम करने वाला सुप्रीम कोर्ट अपने को कहीं लाचार भी पा रहा है।
 
अगर इस मामले का फैसला मालिकाना हक के कानून के लिहाज से होता है तो इस बात की गारंटी नहीं है कि हिंदुओं की आस्था और धार्मिक विश्वास संतुष्ट हो और अगर बाहर समझौता होता है तो आशंका है कि मुस्लिम समाज अपने साथ अन्याय महसूस करे। जाहिर है इस मामले पर राजनीतिक स्तर पर सुलह का प्रयास भी चल रहा होगा। वह प्रयास कितना सफल होता है यह अभी देखा जाना है।
 
किंतु विकास के नाम पर देश और उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के बाद भाजपा ने जिस तरह राम मंदिर और हिंदुत्व को प्रकट रूप से मुद्‌दा बनाया है उससे लगता है कि आने वाले समय में विकास और हिंदुत्व का संयुक्त पैकेज देने की कोशिश चलेगी अब देखना है कि लोकतंत्र इसे कितना सह पाएगा। 
खबरें और भी हैं...