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जीवन और विकास के केंद्र में पर्यावरण को लाना होगा

Bhaskar Editorial | Last Modified - Nov 11, 2017, 07:51 AM IST

आकाश पर फैले धुएं ने देश के सर्वाधिक विकसित इलाके पर पर्यावरणीय आपातकाल जैसी स्थिति पैदा कर दी है।
राष्ट्रीय राजधानीक्षेत्र दिल्ली के आकाश पर फैले धुएं ने देश के सर्वाधिक विकसित इलाके पर पर्यावरणीय आपातकाल जैसी स्थिति पैदा कर दी है। इसका समाधान सिर्फ दीर्घकालिक विचार और व्यवस्था में निहित है। दिल्ली और आसपास की सत्तारूढ़ पार्टियां समवेत रूप से विचार करने की बजाय क्षेत्रीय राजनीति में उलझ गई हैं और यही इस त्रासदी की विडंबना है। इसकी एक बानगी उस बयानबाजी में है, जिसमें पंजाब में अड़े कांग्रेस के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और दिल्ली के आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक-दूसरे को नसीहत दे रहे हैं। उधर भाजपा का प्रतिनिधित्व करने वाले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर खट्‌टर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब से जुड़ी दिल्ली की इस समस्या का समाधान किसी एक राज्य से हाथ में नहीं है। इसमें चार राज्यों का योगदान है और इसका समाधान उन सबको मिलाकर ही हो सकता है। वह समाधान तब तक नहीं होगा जब तक केंद्र सरकार या संघीय संस्थाएं हस्तक्षेप करें। विडंबना यह है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री समझते हैं कि सिर्फ गाड़ियों की सम और विषम संख्या के प्रयोग का कार्यक्रम बना देने से ही समाधान हो जाएगा। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पार्टी के लोग सोचते हैं कि स्वच्छ भारत अभियान का नारा लगाने से ही पर्यावरणीय समस्या का हल हो जाएगी। राष्ट्रीय राजधानी जिस समस्या का सामना आज कर रही है उस समस्या का सामना देश के हर छोटे-बड़े शहर को देर सबेर करना ही है। दिल्ली की मौजूदा समस्या की जड़ में तीव्र शहरीकरण और उससे पहले हुई हरित क्रांति जिम्मेदार है। हरित क्रांति ने एक खास तरह के फसल चक्र को जन्म दिया और शहरीकरण ने एक विशेष जीवन शैली को। हरित क्रांति ने खेती को पशुओं से मुक्त किया और उसी के कारण अनाज के डंठलों की चारे के रूप में उपयोगिता समाप्त हो गई। यही कारण है कि 3.4 करोड़ टन धान पैदा करने वाले दिल्ली के आसपास के इलाके में 2.3 करोड़ बायोमास जलाया जा रहा है। दूसरी तरफ दिल्ली के पड़ोसी राज्यों से रोजाना धुआं छोड़ती हुई लाखों गाड़ियां दिल्ली में प्रवेश करती हैं। निश्चित तौर पर मौजूदा समस्या के तात्कालिक हल के लिए कदम तो उठाने ही होंगे लेकिन दीर्घकालिक हल के लिए पर्यावरणीय चेतना को जीवन और विकास के केंद्र में लाना होगा।
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Web Title: jivn aur vikas ke kendr mein paryaavrn ko laanaa hoga
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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