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जयललिता का जेल जाना

7 वर्ष पहले
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जयललिता शनिवार को तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में बेंगलुरू आईं, लेकिन शाम होते-होते उनका रास्ता जेल पहुंच गया। उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी चली गई। कुछ ही घंटे के अंदर हालिया चुनावी सफलताओं से दमकती उनकी पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईडीएमके) का भविष्य अनिश्चित हो गया। यह सब हुआ विशेष अदालत के फैसले से, जिसने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण कानून की धाराओं के तहत दोषी पाया। इस तरह आमदनी से ज्यादा संपत्ति पकड़े जाने का मुकदमा 18 साल बाद अंजाम पर पहुंचा और इस कानून के तहत मुख्यमंत्री पद गंवाने वाली जयललिता पहली नेता बन गईं। निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने के लिहाज से यह महत्वपूर्ण घटना है, जिसका कानून के राज में यकीन करने वाले सभी लोग स्वागत करेंगे। आजादी के बाद भी लंबा दौर ऐसा रहा, जब सत्ताधारी और रसूखदार लोग कानून के हाथों में आने से बचते रहे। इस सिलसिले का टूटना एक नया घटनाक्रम ही है। इसका श्रेय बेशक जनता के हस्तक्षेप को दिया जाना चाहिए, हालांकि इसमें न्यायपालिका की भूमिका भी प्रशंसनीय है। अगर पिछले साल सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक प्रावधानों की नई व्याख्या करते हुए यह व्यवस्था नहीं देता कि गंभीर मामलों में सजायाफ्ता होते ही सासंदों/विधायकों की सदस्यता चली जाएगी, तो जयललिता तुरंत कुर्सी से बेदखल नहीं होतीं। यह अलग बात है कि फिलहाल वे रिमोट कंट्रोल से संचालित मुख्यमंत्री के जरिये तमिलनाडु प्रशासन पर अपना नियंत्रण बनाए रखेंगी, लेकिन उनके लिए यह संतोष का क्षणिक कारण ही है। अदालती फैसले के तहत उनके 10 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लग गई है। अगर उच्चतर न्यायपालिका ने इस फैसले को स्थगित नहीं किया, तो फिर न सिर्फ उनका बल्कि एआईडीएमके का भविष्य भी अंधकारमय है। 66 वर्षीय जयललिता ने उत्तराधिकारी तैयार करने की कभी जरूरत महसूस नहीं की। दरअसल, उन्होंने पार्टी में किसी नेता की हैसियत को उभरने ही नहीं दिया। प्रश्न है कि आगामी चुनावों में व्यक्ति-केंद्रित यह पार्टी किस चेहरे को पेश करेगी? क्या नेताविहीन पार्टी को लोगों का पहले जैसा समर्थन मिलेगा? जाहिर है, एआईएडीएमके में शून्य और तमिलनाडु में नई संभावनाएं पैदा हो गई हैं। हालांकि, न्याय देर से हुआ, लेकिन यह हुआ। इसके निहितार्थ गंभीर और परिणाम दूरगामी हैं।