नगर सेठ को राजपथ पर बनी अपनी आलीशान हवेली और संपन्नता का बहुत अहंकार था। एक दिन हवेली के बाहरी अहाते में सेठ बैठा था। अहंकार उसके चेहरे पर स्पष्ट देखा जा सकता था। तभी उधर से एक संत गुजरे। सेठ ने उन्हें अभिमान भरी दृष्टि से देखा और फिर हवेली पर अहंकार युक्त निगाह डाली। संत ने सेठ का भाव महसूस कर प्रश्न किया, ‘भाई! इस सराय में कौन रहता है?’ यह सुनकर सेठ को बहुत गुस्सा आया। उसने कहा, ‘क्या आपकी दृिष्ट और अक्ल दोनों ही काम नहीं कर रहे हैं? यह भव्य हवेली आपको सराय नजर आ रही है? अरे, यह करोड़ रुपए खर्च करने के बाद बनी है। संगमरमर से बनी इस हवेली में कीमती से कीमती वस्तुएं लगी हुई हैं।’ संत बोले, ‘बुरा मत मानिए। मुझे बताइए कि इसमें अभी कौन रहता है?’ सेठ ने कहा, ‘मैं और मेरा परिवार।’ संत ने अगला प्रश्न किया, ‘आपके पहले यहां कौन रहता था?’ सेठ बोला, ‘मेरे पिताजी रहते थे।’ संत ने फिर पूछा, ‘और उनसे पहले?’ सेठ ने उत्तर दिया, ‘मेरे दादाजी रहते थे।’ इस तरह संत पूछते गए और सेठ अपने पूर्वजों के नाम बताता गया। तब संत ने समझाया, ‘इतने लोग इस हवेली में रह चुके हैं, तो इसे सराय कहने पर आपको कष्ट क्यों हुआ? आपसे पहले यहां आपके पिताजी, दादाजी और परदादा रहते थे। हमेशा के लिए यहां कौन ठहरा है? जहां लोग आकर रहें और कुछ वक्त बाद चले जाएं, उस सराय पर कैसा अहंकार?’ संत की बात ने सेठ का अहंकार भंजन कर दिया। जीवन की क्षणभंगुरता पहचानकर किसी वस्तु पर अहंकार नहीं करना चाहिए। ज्ञानी जन इसी कारण संसार को ऐसा पड़ाव मानते हैं, जहां मनुष्य ने जन्म लिया और जिससे गुजरकर अपने मूल लक्ष्य, ईश्वर तक पहुंचना है।