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अमेरिका में रॉक स्टार राजनेता

7 वर्ष पहले
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नरेंद्र मोदी आज न्यूयॉर्क से वॉशिंगटन की छोटी सी यात्रा करेंगे, लेकिन इसमें उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात के लिए रॉक स्टार जैसे राजनेता से राजनीतिज्ञ में रूपांतरित होना पड़ेगा ताकि वे अमेरिका से रणनीतिक रिश्तों में नया अध्याय शुरू करने का अपना वादा पूरा कर सकें।
अब तक मोदी की अमेरिका यात्रा कामयाब रही है। वॉशिंगटन पोस्ट ने उन्हें रॉक स्टार बताया है और यह कहने वाला इसका लेख दिनभर का तीसरा सबसे लोकप्रिय लेख रहा। अखबार का रिपोर्टर इस बात से प्रभावित था कि मोदी किस प्रकार भारत के चुनाव परिदृश्य से होलोग्राफिक इमेज और लेजर लाइट्स लेकर आए ताकि मेडिसन स्क्वेयर गार्डन पर शानदार प्रदर्शन कर अमेरिका को इस कला का सबक दे सकें। इतना ही नहीं जिन लोगों को इस शो के टिकट नहीं मिले हैं उनके लिए टाइम स्क्वेयर के अलावा अमेरिका भर में 100 जगहों पर स्क्रीन लगाए गए हैं ताकि वे शो को लाइव देख सकें।
दुनिया के प्रमुख नेताओं में से किसी और के बारे में यह सोचना कठिन है कि वह इतने प्रशंसकों को प्रेरित कर पाएगा ( हो सकता है चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिन की पत्नी और लोक गायिका जनरल पेंग लियुआन चीन के लोगों को प्रेरित कर पाएं)। हालांकि, किसी रॉक स्टार को मोदी जितनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। 50 भाषण तथा अन्य कार्यक्रम और वह भी उस चमचमाते पैकेज के बिना, जो आम रॉक सितारों को प्रेरित करते हैं।

किंतु अब माहौल जरा अलग होगा। अब मोदी को कहीं अधिक कठिन परफॉर्मेंस के लिए खुद को तैयार करना होगा। न सिर्फ उन्हें राजनीतिज्ञ बनना होगा बल्कि दो महान देशों के बीच उन रिश्तों को नया रूप देने के प्रयास करने होंगे, जो प्राय: कंटीले रहे हैं और व्यक्तिगत मिजाज और वृहद् परिदृश्य न देख सकने की अक्षमता के शिकार रहे हैं।
भूतकाल के मुश्किल दौर के जख्मों के दाग अब भी बने हुए हैं। उन दिनों को याद करें जब रिचर्ड निक्सन अमेरिका के राष्ट्रपति थे और हेनरी किसिंजर उनके निकटतम सलाहकार थे और भारत में उतने ही जटिल व्यक्तित्व की इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। उस वक्त पता चला था कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को अच्छे या बुरे सांचे में ढालने में संबंधित लोगों के व्यक्तित्व का कितना महत्व होता है। निक्सन और इंदिरा गांधी के बारे में राय अब भी मिश्रित है, लेकिन किसिंजर को आज दुनिया के महान राजनीतिज्ञ का सम्मान प्राप्त है। इसके बावजूद 1970 के दशक में माओ त्से तुंग के चीन के साथ अमेरिका के संबंधों की शुरुआत के सूत्रधार के रूप में वे अपने मिशन में इतने अंधे हो गए थे कि पाकिस्तानी सेना की वेदी पर बांग्लादेश के लोगों की बलि देने और भारत की अनदेखी के लिए भी तैयार हो गए थे।
आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है और आर्थिक व राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ नए खिलाड़ी उभरे हैं। कुछ दुनिया पर राज करने की आकांक्षा रखते हैं तो कुछ अपने क्षेत्र के मालिक बनना चाहते हैं। आप कहीं भी िनगाह डालें अफ्रीका, मध्य पूर्व और चाहे एशिया में, सब जगह तनाव व अनिश्चितता है और भयावह रक्तपात के साथ पुरानी व्यवस्था हिलती नजर आ रही है।
आज भारत का महत्व यह है कि राजनीतिक या आर्थिक सहयोगी के रूप में इसे चारों तरफ से लुभाया जा रहा है। ब्रिक्स के शिखर सम्मलेन, जापान की यात्रा, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी और अब तक की सफल अमेरिका यात्रा में मोदी ने यह साबित किया है।
आइए इस तथ्य की भी अनदेखी न करें कि भारत को भी दुनिया की जरूरत है। आर्थिक चमत्कार का अगला चरण सुनिश्चित करने के लिए विदेशी निवेश आवश्यक है। उसी तरह दुनिया को भी मजबूत भारतीय अर्थव्यवस्था की दरकार है। भारत को इस नाजुक सवाल का हल खोजना है कि पाकिस्तान या चीन के साथ सैन्य टकराव में न पड़कर वह अपनी अर्थव्यवस्था के विकास का कैसे सुसूत्रीकरण करे। अमेरिका के साथ अच्छे रिश्ते मुख्य कुंजी है, लेकिन यह आसान नहीं है। अमेरिका अब भी दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। हालांकि, उतना शक्तिशाली नहीं, जितना यह समझता है। यह अब भी दुनिया के बेताज बादशाह की तरह अपना प्रभाव डालने में लगा रहता है। अपने तटवर्ती क्षेत्रों में चीन यही प्रवृत्ति दिखा रहा है। ताकत आते ही प्रवृत्ति ऐसी ही हो जाती है। एक छोटा सा उदाहरण देना मौजू होगा। मोदी के अमेरिका आने की पूर्व संध्या पर अमेरिका के नेशनल एसोसिएशन ऑफ मेन्यूफैक्चरर्स ने बयान जारी कर ओबामा से अपील की कि मेन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में अमेरिकी जॉब्स को लेकर भारत के कथित भेदभाव के खिलाफ वे कानून बनाएं। इसने दावा किया कि पिछले एक साल में भारत की सरकारी एजेंसियों और अदालतों ने अमेरिका में मेन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र के रोजगार की कीमत पर भारतीय निगमों को फायदा पहुंचाने का काम किया है।
जैसा कि मैंने पहले कहा है मोदी को स्पष्ट नियम बनाने होंगे और सबके लिए समान अवसरों का माहौल तैयार करना होगा ताकि भारतीय और संभावित विदेशी निवेशक व व्यापारियों को अवसरों व प्रतिबंधों का अर्थ समझ में आए और भारतीय अदालतें भी विवाद की स्थिति में साफ-सुथरे नियम लागू कर सकें।
अब जब भारतीय प्रधानमंत्री वॉशिंगटन जा रहे हैं तो वे आलीशान ब्लेयर हाउस में ठहरेंगे। यह उस पेनसिल्वेनिया एवेन्यू के ठीक उस पार है, जहां व्हाइट हाउस स्थित है। अमेरिका के पूर्व सहायक विदेश मंत्री और अब ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के प्रमुख स्ट्रोब टालबोट ने कहा है कि जी-20 और ब्रिक्स में महत्वपूर्ण भूमिकाओं के साथ भारत को नया वैश्विक महत्व मिला है।
मोदी और ओबामा दोनों के सामने एेसे मजबूत, विकसित और समावेशी भारत को बढ़ावा देने की चुनौती है, जो वैश्विक समुदाय के साथ ताल िमलाकर चल सके। टालबोट ने भी कहा है कि नए भारत-अमेरिकी रिश्तों की संभावना को वादे में, वादे को प्रदर्शन में और प्रदर्शन को प्रगति में बदलने का लक्ष्य सामने है। हिंदी में कहावत है, ताली एक हाथ से नहीं बजती, इसलिए दोनों नेताओं को ही कदम बढ़ाने होंगे।

भूतकाल में भारत के साथ समस्या यह थी कि वहां विभाजित, शिकायती सरकार थी, जो वादों पर खरी नहीं उतर पाती थी। आज मोदी के पास बड़ा जनादेश है, इसलिए वे ओबामा को चुनौती दे सकते हैं कि क्या वे दोनों देशों को नए स्तर पर ले जाने के लिए कांग्रेस, अमेरिकी बिज़नेस और जनता को साथ लेकर चल सकते हैं। इस सब में दो महान लोकतंत्रों के बीच नए रिश्ते दांव पर लगे हैं। ऐसे रिश्ते जो दुनिया को बेहतर राह, मित्रता, निवेश, व्यापार व आर्थिक प्रगति दिखा सकते हैं। इन रिश्तों के पीछे है पुरानी सभ्यता जिनके कई लोग नई सभ्यता में चले गए हैं, लेकिन दोनों के बीच पुल बनाना चाहते हैं।
केविन रैफर्टी
प्लेन वर्ड्स मीडिया
के एडिटर इन चीफ
plainwordseditor@yahoo.com