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समाज के विवेक के लिए चुनौती है पद्‌मावती विवाद

1 दिसंबर को रिलीज होने जा रही इस फिल्म को प्रमाण-पत्र देने का निर्णय केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को करना है।

Bhaskar Editorial | Last Modified - Nov 17, 2017, 05:08 AM IST

पद्‌मावती फिल्म पर मचे घमासान को देखकर ऐसे कट्‌टर होते समाज का भय उत्पन्न होता है, जिसके आगे अभिव्यक्ति की आज़ादी जौहर करने पर मजबूर है। 1 दिसंबर को रिलीज होने जा रही इस फिल्म को प्रमाण-पत्र देने का निर्णय केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को करना है। बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कहा है कि उन्होंने अभी फिल्म नहीं देखी है और सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड के अधिकार में हस्तक्षेप से मना किया है। ठीक-ठीक किसी को नहीं मालूम नहीं कि फिल्म में क्या है लेकिन, करणी सेना ने रानी पद्‌मावती के चरित्र और उनके जौहर के अपमान के नाम पर पूरे देश में आंदोलन की धमकी दी है। नतीजा यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने भी केंद्र को फिल्म रिलीज होने से रोकने की सलाह दे दी है। विवाद का एक हिस्सा तो इतिहास मिथक को मिलाकर रचना करने की आज़ादी से जुड़ा है और उसी के साथ जुड़ा है किसी जातीय और धार्मिक समाज के मान-अपमान का सवाल। आमतौर पर हिंदू समाज वैसा कट्‌टर नहीं रहा है जैसा इस्लामी समाज। यहां अपने देवी, देवताओं पर रचनात्मक स्वतंत्रता असीमित रही है। प्रमाण हैं कालीदास, वाल्मीकि, वेदव्यास और जयदेव के तमाम ग्रंथ। दूसरा पक्ष फिल्म से जुड़ी राजनीति और उससे तैयार दुधारी तलवार की धार का है। इसका एक हिस्सा तो फिल्मकार की रणनीति से जुड़ता है, जो फिल्म के प्रचार के लिए ऐेसे विवाद खड़ा करता है। संभव है कि फिल्म में घूमर नृत्य के दृश्य ही हों या उससे वैसा आपत्तिजनक निकले जैसा दावा किया जा रहा है। विवाद का दूसरा पक्ष उस राजनीति से जुड़ता है, जो हर छह महीने पर होने वाले चुनावों में जाति-धर्म की भावनाएं भड़काकर उनका दोहन करना चाहती है। जैसे-जैसे गुजरात चुनाव नज़दीक रहा है वैसे-वैसे राजनीतिक ध्रुवीकरण की मांग बढ़ रही है। फिल्म का विवाद उसे बढ़ाएगा। निश्चित तौर पर लोकतंत्र में समाज के हर हिस्से को विरोध प्रदर्शित करने का अधिकार है लेकिन, देखना होगा कि वह विरोध तथ्य पर आधारित है या सुनी-सुनाई बातों पर। उसे कौन कर रहा है? उस विरोध में तार्किकता है या सिर्फ भावुकता है। यह भी देखना होगा कि विरोध प्रदर्शन संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का किस हद तक हनन करता है। पद्‌मावती पर छिड़ा यह युद्ध इस समाज और उसके संस्थाओं के विवेक के लिए एक चुनौती है। उनका दायित्व है कि उसे समझदारी से निपटाएं।
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Web Title: smaaj ke vivek ke liye chuNaoti hai pd‌maavti vivaad
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