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ऐसे बढ़ती है बाजार में आलू की कीमत

7 वर्ष पहले
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रणबीर समद्‌दर.
प्याज की कीमतें बढ़ने पर बड़ा हल्ला मच जाता है, लेकिन आलू भी गाहे-बगाहे उसी राह जाता रहता है। देश में पश्चिम बंगाल आलू का सबसे बड़ा उत्पादक है। वहां सालाना 1 करोड़ टन आलू पैदा होता है। वहां से वह उन राज्यों में जाता है, जहां उतना आलू नहीं पैदा होता। वहां आलू की औसत लागत आती है 5 से साढ़े पांच रुपए किलो।
यदि आलू उत्पादक से सीधे बाजार में पहुंच गया तो 8 से 9 रुपए किलो कीमत मिल जाता है। व्यापारी या एजेंट यही आलू 8 रुपए किलो में खरीदकर थोक बाजार या कोल्ड स्टोरेज मालिकों को 9 से साढ़े नौ रुपए किलो में बेचते हैं। हालांकि, कोल्ड स्टोरेज से जब यह आलू छोटे व्यापारियों, बाजारों व अन्य राज्यों के लिए रवाना होता है तो कीमत हो जाती है 20 से 22 रुपए किलो। जुलाई-अगस्त वह समय होता है जब आलू अन्य राज्यों की ओर रवाना होता है।
उड़ीसा व कर्नाटक जैसे आलू की कम उपज वाले राज्यों में इसकी कीमत 35 रुपए किलो तक पहुंच जाती है। इसके पहले ही कोल्ड स्टोरेज से व्यापारी के हाथ में जाने तक कीमत 70 से 80 फीसदी बढ़कर 20 रुपए तक पहुंच जाता है। यह सही है कि कोल्ड स्टोरेज में बिजली का भारी खर्च आलू की लागत में जुड़ जाता है, लेकिन फिर भी कीमतों में वृद्धि अपेक्षा से ज्यादा ही होती है। अन्य राज्यों में आलू जाने के बाद पश्चिम बंगाल में भी आलू की कीमत बढ़ने लगती है।
इस साल राज्य सरकार ने आलू की कीमत न बढ़ने देने के लिए कमर कस ली। उसने अन्य राज्यों को आलू के निर्यात पर रोक लगाकर स्थानीय बाजार में आलू की कीमत 14 रुपए किलो तय कर दी। विपक्षी दल शोर मचाने लगे कि व्यापार का गला घोटा जा रहा है। कोल्ड स्टोरेज मालिक कहने लगे कि उन्हें बेवजह निशाना बनाया जा रहा है। अन्य राज्य गुस्सा हो गए और कहने लगे कि पश्चिम बंगाल स्वतंत्र व्यापार में अड़ंगे लगा रहा है। उन्होंने धमकी दी कि वे भी उन चीजों की आपूर्ति पर पाबंदी लगा सकते हैं, जिनकी पश्चिम बंगाल को जरूरत हो सकती है। अन्य राज्यों को निर्यात धीरे-धीरे खोला गया। विपक्ष ने पूरे मामले को राज्य सरकार की अक्षमता का उदाहरण बताया।
इस पूरे मामले में कोल्ड स्टोरेज मालिकों पर किसी ने उंगली नहीं उठाई। एक बात तो स्पष्ट है कि राज्य में कोल्ड स्टोरेज की संख्या कम है। 1 करोड़ टन पैदावार के हिसाब से राज्य में 70 लाख टन आलू स्टोर करने की ही क्षमता है। कुछ मामलों में खेत और कोल्ड स्टोरेज की दूरी असुविधाजनक रूप से दूर है। ऐसे में किसानों को आलू बड़े व्यापारियों को बेचना पड़ता है। इस कड़ी में जितने हिस्सेदार बढ़ते जाते हैं उतनी कीमत बढ़ती जाती है और आलू लागत मूल्य की तुलना में कम से कम 20 फीसदी महंगा तो हो ही जाता है। ज्यादातर उत्पादक छोटे किसान है। उन्हें संस्थागत लोन नहीं मिलता, सहकारी स्तर पर कोल्ड स्टोरेज के लिए मदद नहीं मिलती। इस तरह हर साल विशेष अवधि में आलू की कीमतों में वृद्धि होती है अौर हमारे अर्थशास्त्री जटिल गणनाओं में लग जाते हैं।

लेखक कोलकाता रिसर्च ग्रुप के डायरेक्टर हैं।