प्रधान न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढ़ा ने अगर यह याद दिलाने की जरूरत महसूस की कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं हो सकता, तो इसका एक संदर्भ है। फौरी बात तो न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक का पारित होना है, जिसका मकसद उच्चतर न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को बदलना है। बहरहाल, इसका व्यापक संदर्भ यह है कि केंद्र में 25 वर्षों के बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है, वहीं पूरा राजनीतिक वर्ग न्यायपालिका पर लगाम लगाने को आतुर दिखता है। बिना न्यायपालिका को भरोसे में लिए न्यायिक नियुक्ति आयोग बिल का सर्वदलीय सहमति से पारित होना इस बात का प्रमाण है। प्रधान न्यायाधीश संभवतः इस सच्चाई के प्रति जागरूक हैं कि राजनेताओं को अपनी मंशा पूरा करने का मौका खुद न्यायपालिका के एक हिस्से ने दिया। कई जजों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप, कॉलेजियम सिस्टम के तहत जजों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद की शिकायतें और न्यायिक सक्रियता के नाम पर अदालतों द्वारा अपने अधिकार-क्षेत्र के अतिक्रमण की बढ़ती आलोचनाओं ने वह माहौल बनाया, जिसमें राजनीतिक दल अपनी इच्छा पूरी कर पाए, इसीलिए जस्टिस लोढ़ा ने कहा, ‘यह महत्वपूर्ण है कि न्यायपालिका भ्रष्टाचार से मुक्त रहे।.. यह उन्नतशील लोकतंत्र में सबसे बुरे किस्म की बीमारी है।’ इसके बावजूद इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती, जैसा कि जस्टिस लोढ़ा ने भी कहा कि कानून के शासन की रक्षा करने में न्यायपालिका की सर्वोपरि भूमिका है। दरअसल, इस बिंदु पर भारतीय न्यायपालिका की सराहनीय भूमिका रही है। गौरतलब है कि भारतीय संविधान में बहुमत के शासन के साथ कानून के राज की धारणा का संतुलन बनाने का सूक्ष्म एवं जटिल प्रयास किया गया है। लोकतंत्र बहुमत से चलता है, लेकिन बहुमत कानून के शासन के खिलाफ नहीं जा सकता। इसी समझ के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के बुनियादी ढांचे की अवधारणा विकसित की। कोई भी अधिनियम इस ढांचे का उल्लंघन नहीं कर सकता। क्या न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून इस कसौटी पर खरा है, यह न्यायिक परीक्षण में अभी तय होना है। बहरहाल, इस मुद्दे पर संसद और न्यायपालिका में टकराव न हो, यही देश के हित में है। जस्टिस लोढ़ा के वक्तव्य में न्यायपालिका की आशंकाएं जाहिर हुई हैं। उन्हें दूर करना राजनीतिक वर्ग का दायित्व है।