आज स्कॉटलैंड में हो रहे जनमत संग्रह के नतीजे से तय होगा कि कभी दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य का मालिक रहा ब्रिटेन अब अपना मौजूदा नक्शा भी कायम रख पाता है या नहीं, लेकिन इस जनमत संग्रह पर केवल संयुक्त राजतंत्र (यानी यूनाइटेड किंगडम) के रूप में ब्रिटेन का भविष्य ही दांव पर नहीं है। बल्कि इसके दूरगामी परिणाम यूरोपीय संघ (ईयू) के वर्तमान ढांचे, वहां जारी आर्थिक नीतियों और प्रकारांतर में पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे। यह तो तय है कि 53 लाख आबादी वाले स्कॉटलैंड के लोग चाहे फैसला आजादी के पक्ष में करें या वे यूके को कायम रखने का इंग्लैंड को एक और मौका दें, ब्रिटेन अपने वर्तमान स्वरूप में आगे नहीं बना रहेगा। ब्रिटेन में मौजूदा कंजर्वेटिव-लिबरल सरकार और विपक्षी लेबर पार्टी, सभी ने वादा किया है कि स्कॉटलैंड का फैसला यूके में बने रहने के पक्ष में हुआ, तो उसकी चारों इकाइयों इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड को सत्ता का अधिक हस्तांतरण किया जाएगा। लेबर पार्टी ने आर्थिक नीतियों में बदलाव का भी वादा किया है। धारणा है कि इन नीतियों के कारण देश की वित्तीय एवं आर्थिक व्यवस्था पर बहुराष्ट्रीय बैंकों और कंपनियों का नियंत्रण हो गया है। इसी के तहत आमजन पर किफायत की नीतियां थोपी गईं, जिससे उनकी हालत बिगड़ी। माना जाता है कि ब्रिटेन की इसी दिशा ने स्कॉटलैंड में असंतोष भड़काया, जिससे आजादी समर्थक समूहों के पक्ष में जनमत झुकता गया। फिर ब्रिटेन का अमेरिकी नीतियों पर चलना भी स्कॉट लोगों को नहीं सुहाता। भविष्य में ब्रिटेन इन नीतियों से हटता है, तो यह बदलाव महज उस तक ही सीमित नहीं रहेगा। उधर, स्कॉटलैंड ने अलग होने का फैसला किया, तो ब्रिटेन में ईयू विरोधी ताकतों को बल मिलेगा। प्रधानमंत्री डेविड कैमरन पहले ही एलान कर चुके हैं कि अगले वर्ष कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में आई तो ब्रिटेन ईयू में रहे या नहीं, यह तय करने के लिए वह 2017 में जनमत संग्रह कराएगी। लंदन को बहुराष्ट्रीय खासतौर पर अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के लिए यूरोप का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यह बंद हुआ, तो वैश्विक पूंजी की मुश्किलें और बढ़ेंगी। पहले से ही संकटग्रस्त विश्व अर्थव्यवस्था के लिए इससे बुरी खबर कुछ नहीं हो सकती, इसीलिए स्कॉटलैंड के फैसले पर पूरी दुनिया की नजर है।