अभिलाष खांडेकर.
भारतीय राजनीति में यूं हर चुनाव पिछले चुनाव से अलग होता है। मतदाता भी लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय निकायों के चुनाव व उपचुनावों में मतदान अलग-अलग मुद्दों को ध्यान में रखकर करते हैं। फिर भी उपचुनावों के नतीजे, जो प्रधानमंत्री के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले आए हैं, भाजपा के लिए निश्चित ही ‘अच्छे दिन’ नहीं ला सके हैं।
लोकसभा के चुनाव सोनिया गांधी-राहुल-
मनमोहन सिंह सरकार की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और महंगाई पर काबू पाने में नाकामी की पृष्ठभूमि पर लड़े गए थे। मोदी जैसे बेहद मेहनती, राजनीतिक रूप से चतुर और कार्यक्षम नेता ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सर्वव्यापी मदद से देश के निराशा भरे वातावरण को भांपकर उम्दा चालें चलीं और भव्य बहुमत से दिल्ली में सरकार बन गई। हालांकि, यह मानना कि ‘मोदी लहर’ चलती ही चलेगी और देश का भगवाकरण हो चुका है, शायद गलत था। 32 में से सिर्फ 12 सीटें जीत पाना बताता है कि भाजपा को अपने अंतर में झांकना होगा। निश्चित ही मोदी सरकार के 100 दिवसीय कामकाज को देखकर हुए मतदान के नतीजे नहीं हैं, न ही राजस्थान सरकार के खिलाफ की नाराजगी है परंतु फिर भी ‘आत्म-मुग्ध पार्टी’ को तगड़ा झटका तो है ही। इसे न मानना, सत्य से आंख चुराना होगा।
उत्तरप्रदेश में लचर शासन के बाद भी मुलायम-अखिलेश की बल्ले-बल्ले हो गई है। यह अचरज की बात है। हां, मायावती की बसपा का चुनाव न लड़ना सपा के फायदे में रहा। उसी राज्य में कांग्रेस का एक भी सीट नहीं जीत पाना वहां से चुनाव लड़ने वाले राहुल और सोनिया के लिए शर्मनाक है। गुजरात में जरूर कांग्रेस ने राजस्थान की तर्ज पर तीन सीटें जीती हैं। भाजपा के लिए गुजरात व उत्तरप्रदेश की हार खतरे की हल्की घंटी है।
अमित शाह ने पिछले दिनों महाराष्ट्र में यह जरूर कहा था कि मोदी के नाम पर नहीं बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट मांगें तो अधिक फायदा होगा। क्या शाह को पहले ही ऐसे नतीजों की आहट मिल गई थी?
नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार के साथ आज दिक्कत यह है कि उन्होंने जनता की अपेक्षाएं इतनी अधिक बढ़ा दी हैं कि उन्हें जल्दी पूरा कर पाना कठिन है। मोदी सरकार काम तो कर रही है परंतु कई वर्षों से चले आ रहे ढर्रे और सड़े-गले तंत्र को बदलना जादू की छड़ी घुमाने जैसा आसान नहीं है। काम के नतीजे आने में देर लगेगी, लेकिन पेट्रोल-डीजल के भाव कम करना या रुकी हुई योजनाअों को तुरंत पर्यावरणीय स्वीकृति देना या संसद में न्यायाधीशों की नियुक्तियों के बिल को पास करवा लेना एवं पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने की प्रक्रिया ठोस रूप से प्रारंभ करना अच्छी बाते हैं।
यह सब होने के बावजूद उपचुनाव से उपजे संकेतों को स्वयं नरेंद्र मोदी भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। भाजपा में अंदर ही अंदर उनकी कार्यशैली पर भी नाराजगी पैदा हो रही है। वे कहते जरूर हैं, ‘सबका साथ सबका विकास’, लेकिन ऐसा पार्टी और सरकार में हो नहीं रहा। हरियाणा में पार्टी में झगड़े हैं और महाराष्ट्र में अच्छी स्थिति होते हुए भी शिवसेना से अभी पटरी ठीक से बैठी नहीं है। अब इन दोनों राज्यों पर निगाहें गड़ी हैं।
-लेखक दैनिक भास्कर समूह के राजनीतिक संपादक हैं।
abhilash@dbcorp.in