सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सतर्कता अायुक्त (सीवीसी) और सतर्कता आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव का उल्लेख करते हुए इन पदों पर सिर्फ नौकरशाहों के ही चयन पर सवाल उठाया है। गौरतलब है कि मौजूदा सीवीसी प्रदीप कुमार का कार्यकाल 28 सितंबर को पूरा हो रहा है। इन खबरों के बीच कि सरकार ने नया सीवीसी चुन लिया है, एक एनजीओ ने जनहित याचिका लगाकर आरोप लगाया कि एक वर्ग से ही इस पद पर नियुक्तियां की जा रही हैं। दरअसल, मौजूदा राजनीति से एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ है, जो सारी सत्ता अपने हाथ में लेना चाहता है, सभी सूचनाओं तक पहुंच चाहता है और शासन में जो कुछ भी हो रहा है, उस पर निगरानी रखना चाहता है। ऐसे वातावरण में लोक-प्रशासन को स्वच्छ और पारदर्शी बनाए रखना कठिन हो जाता है। जब पारदर्शिता की बात आती है तो नौकरशाही ही सबसे बड़ी बाधा नजर आती है। दुनियाभर के लोकतंत्रों का यही अनुभव है। पारदर्शिता का मतलब है पुराने सत्ता तंत्र में नए मूल्यों की स्थापना, इसलिए यह अंतहीन प्रक्रिया है। पीजे थाॅमस की सीवीसी पद पर नियुक्ति को लेकर उठे विवाद के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने विस्तृत गाइडलाइन जारी करते समय ही चुनाव को सिविल सेवा तक सीमित न रखने को कहा था। उसने कार्मिक िवभाग से सारे नामों पर विचार कर पांच नाम उच्चस्तरीय समिति को भेजने का प्रावधान किया था। इसमें खारिज किए नामों का विस्तृत कारण देने को कहा था। इसी तरह उच्चस्तरीय समिति द्वारा चुने गए व्यक्ति पर समिति के किसी सदस्य को आपत्ति होने पर उसकी अापत्ति पर गौर न करने के कारणों को स्पष्ट करने के निर्देश दिए थे। जाहिर है सर्वोच्च न्यायालय सीवीसी की नियुक्ति में निष्पक्षता और पारदर्शिता चाहता है। गौरतलब है कि जब मोदी सरकार पर नौकरशाहों के जरिये सरकार चलाने के आरोप लग रहे हैं तब सीवीसी में नौकरशाहों की नियुक्ति पर सवाल उठे हैं। सरकार के लिए स्पष्ट संदेश है कि नौकरशाही के बाहर भी देश में प्रतिभा मौजूद है, जिसे मौका देकर सीवीसी की कार्यप्रणाली को ढर्रे में बदलने से रोका जा सकता है, क्योंकि नए-नए क्षेत्रों से आने वाली प्रतिभाएं इस संस्था में निश्चित ही नई बातें लाकर इसे और कारगर बनाएंगी।