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प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा उचित नहीं

7 वर्ष पहले
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कविता विकास.
अजीब विडंबना है कि हमारी प्राथमिकताओं से गौण होती जा रही है बच्चों की पढ़ाई और उनसे जुड़ी समस्याएं। शायद ही किसी का ध्यान इस ओर जाता है कि बाल साहित्य धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। दादी-नानी की कहानियां एकल परिवार के गठन के साथ उठ गईं और वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में पैसों की खनक केवल बेस्टसेलर के साथ जुड़ गई। अमर चित्रकथा, चाचा चौधरी और चंदामामा को पढ़ने का समय अब टीवी और इंटरनेट ने ले लिया। अपनी पौराणिक धरोहरों और संस्कृति की परिभाषा चित्रों और अल्प वाक्यों से सहज देने वाला बाल साहित्य आधुनिकीकरण के साथ ताल नहीं मिला सका। एक समय आएगा जब बुनियाद इतनी भुरभुरी होगी कि निर्माण असमय ध्वस्त हो जाएगा।
2010 में शिक्षा का अधिकार देने के बाद देश के छह से 14 वर्ष के 96 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। लेकिन स्कूलों की आंतरिक व्यवस्था पर सदा सवाल उठता रहा है। कहीं शिक्षक नहीं हैं तो कहीं शिक्षकों के पास देने लायक ज्ञान नहीं है। सरकारी स्कूलों में भारत ऐसा पहला देश है, जहां सरकार 12 लाख 65 हजार स्कूलों के 12 करोड़ बच्चों को मध्याह्न भोजन दे रही है। निर्धन बच्चों को स्कूलों से जोड़ने का यह सबसे सशक्त साधन है, लेकिन सरकारी शिक्षक इन मिड डे मील की फाइलें निबटाने के लिए पढ़ाई से अक्सर समझौता कर लेते हैं, इससे वे अपने मूल ध्येय से अलग होकर बच्चों के बहुमूल्य समय की भी उपयोगिता दरकिनार कर देते हैं। इतना होने पर भी इन भोजनों में कभी छिपकली तो कभी चूहे मिल जाते हैं।

कपिल सिब्बल ने विदेशों के तर्ज पर नई सतत मूल्यांकन पद्धति लागू की। भारतीय परिवेश में इसकी उपयोगिता तभी है जब बच्चों में अतिरिक्त योग्यता का विकास हो। जिस देश में स्कूल के बाद बच्चे अपने पेट की आग बुझाने के लिए लकड़ी काटने और अन्य पेशे में लगे हों, वहां ऐसी पद्धति का क्या लाभ? सतत मूल्यांकन प्रणाली लिखित परीक्षा के साथ-साथ उनके समग्र व्यक्तित्व का मूल्यांकन करती है, पर कुछेक मॉडल स्कूलों को छोड़ कर यह प्रणाली असफल रही है। प्राइवेट स्कूलों में एक कक्षा में जितने बच्चे होने चाहिए, उससे दुगुने-तिगुने भरे हुए हैं, ऐसे में मूल्यांकन एक खानापूर्ति हो कर रह गया है। दसवीं-बारहवीं कक्षा के टीनएजर्स में सुसाइड, मारपीट, अपहरण आदि तेजी से फैल रहा है। इसीलिए प्राथमिक कक्षाओं में ही जब बच्चे टेंडर एज में होते हैं, ऐसे पाठ्यक्रम को लाना चाहिए, जो उनमें नैतिक मूल्यों का विकास कर सके। सरकार की अहम जिम्मेदारी है कि पाठ्यक्रम में बदलाव लाए। ऐसे पाठ जो मनोरंजन के साथ-साथ देश की समस्याओं से रूबरू करा दे। देशभक्ति की भावना जगाने और सुकर्मों के प्रति कृतज्ञता लाने वाले पाठ-साहित्य का नितांत अभाव है। बड़ी योजनाओं के साथ इन छोटी-छोटी चीजों पर भी परिवर्तन लाना सरकार के एजेंडे में होना चाहिए। पाठ्यक्रम की लचर प्रणाली न तो दिमागी तौर पर इन्हें पुष्ट बनाती है और न शारीरिक तौर पर मजबूत। जिस देश की शिक्षा मंत्री कला-साहित्य की मर्मज्ञ हैं, उनसे कम से कम ऐसी अपेक्षा तो की ही जा सकती है।

झारखंड की शिक्षाविद् व टिप्पणीकार
kavitavikas28@gmail.com