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महिलाओं की सुरक्षा किसके भरोसे?

7 वर्ष पहले
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महिला सुरक्षा किसी बाहरी एजेंसी के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती फिर चाहे पुलिस के पास 27 वर्षीय महिला यात्री से दुराचार के मामले में उबर टैक्सी कंपनी के खिलाफ ठोस आरोप ही क्यों न हों। दिल्ली में दुराचार के लिए टैक्सी कंपनी को दोषी ठहराना तो महिला सुरक्षा को आउटसोर्स करने जैसा ही हुआ। कम ही लोग मानेंगे कि यह मामला घोर लापरवाही का नहीं है। उबर को देखें तो वह अपने ड्राइवरों की पृष्ठभूमि जांचने की कड़ी प्रक्रिया के वादे पर खरी नहीं उतरी है। इस मामले में तो लगता है कि कंपनी को ज्यादा से ज्यादा कुछ मालूम था तो इतना ही कि ड्राइवर के पास लाइसेंस था।
ऐसा लाइसेंस जो दिल्ली में जारी नहीं किया गया था, जिससे काम चलने लायक माना जाता है। क्या उबर जैसे ब्रांड के तहत काम करने के लिए इतना काफी है? अपनी वेबसाइट पर उबर अमेरिका में अपनी कैब ड्राइवरों की पृष्ठभूमि की जांच के लिए बहुस्तरीय प्रक्रिया की बात करती है। फिर उसने यही प्रक्रिया भारत में भी अपनानी जरूरी क्यों नहीं समझी? खासतौर पर तब जब भारत में महिलाएं सार्वजनिक क्षेत्र में अपनी जगह के लिए संघर्ष कर रही हैं और जिसका बहुत प्रचार भी हुआ है।
इसके साथ उसकी सुरक्षा लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। दो साल पहले तो इसी मुद्‌दे पर पूरा देश आंदोलित था। हालांकि, उबर को ज्यादा से ज्यादा इस बात का दोषी माना जा सकता है कि उसने हमें यह यकीन दिलाकर कि उसके ड्राइवर व टैक्सी सुरक्षित हैं, झूठी सुरक्षा के अहसास में गाफिल बना दिया। थोड़ा गौर से देखें तो उबर के ‘बिज़नेस मॉडल’ के तहत टैक्सी में सुरक्षा को सुनिश्चित करना लगभग असंभव बात है। सच तो यह है कि रात में सार्वजनिक परिवहन के किसी अन्य माध्यम की तुलना में उबर अधिक सुरक्षित नहीं है। यदि मुझसे पूछा जाए तो मैं ‘संख्या में सुरक्षा’ के सिद्धांत पर भरोसा करके मेट्रो में जाना पसंद करूंगी।
हालांकि, इस मामले में भी हम जानते हैं कि किसी अनहोनी पर साथ में सफर कर रहे लोग कैसा व्यवहार करते हैं। मेरठ और रोहतक की घटनाएं बताती हैं कि जब दोनों मामलों में महिलाएं अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रही थीं तो साथ के अन्य लोग कैसे मूक दर्शक बने रहे। हम चाहें इस तथ्य की बात न भी करें कि कौन दोषी था पर हिंसा रोकने के लिए भी कोई आगे नहीं आया। यहां मैं सुरक्षा के व्यापक सवाल पर आती हूं कि दो साल पहले इस मुद्‌दे पर पूरी दिल्ली सड़कों पर उतर आई थी, उसके बाद से क्या बदला है? हमें तो पहले ही झलक मिल गई है कि आने वाले दिनों में कैसी परिस्थितियों की अपेक्षा करनी चाहिए।
हम ‘आप’ और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को राजधानी में प्रदर्शन करते देख ही चुके हैं, जो सारा दोष भाजपा सरकार पर मढ़ने की फिराक में हैं। टीवी की बहसों में तो राजनीतिक दलों ने दोषारोपण का खेल शुरू भी कर दिया है। प्रत्येक दल दूसरे के लिए महिला सुरक्षा का रिकॉर्ड पेश कर रहा है और अनजाने ही खतरनाक रूप से यह जाहिर कर रहा है कि महिलाओं की सुरक्षा पूरे देश का ही मुद्‌दा है, फिर सरकार चाहे जिस दल की क्यों न हो। राजनीतिक दलों को अभी यह अहसास ही नहीं है कि इस देश में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में सिर्फ 1.41 फीसदी ही कम है (आम चुनाव 2014 के आंकड़ों के मुताबिक) और वह एक ऐसा वोट बैंक है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, न ही की जानी चाहिए।
उबर पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और सोशल मीडिया इस कदम के पक्ष और विरोध में उबल पड़ा है। इस टैक्सी सेवा की सुविधा को देखते हुए वे इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि उबर पर प्रतिबंध को जर्मनी और हॉलैंड की अदालतों ने भी सही माना है। अन्य यूरोपीय देशों में भी इसी प्रकार की कार्रवाई अपेक्षित है। तथ्य तो यह है कि यह सुविधा भी सिर्फ रैफर करने की सुविधा भर है। मोटेतौर पर देखें तो व्यवस्था यह है कि आप कंपनी से संपर्क करते हैं और वह किसी ड्राइवर से संपर्क कर टैक्सी भेज देती है। अमेरिका में तो यह अपने ड्राइवरों की जांच के लिए कड़ी प्रक्रिया अपनाने का दावा करती है (वास्तव में ऐसा है अथवा नहीं), लेकिन यहां वह ऐसा नहीं करती, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे भारतीय कानूनों को ‘चलता है’ के रवैये से लेती है, जो हमारी ही करतूत है।
हमने ही अपने कानूनों का मखौल उड़ाकर यह छवि निर्मित की है। उबर के सीईओ का बचाव इतना निर्लज्ज था कि उसने तो इस घटना के लिए टैक्सी लाइसेंस प्रक्रिया में जांच की कड़ी प्रक्रिया के अभाव को ही दोषी ठहरा दिया। यह एक ऐसा आरोप है, जिसे हमें कड़वे घूंट के साथ स्वीकार करना होगा, क्योंकि यही सच्चाई है, लेिकन हमारे राजनेता और जनप्रतिनिधि इस मुद्‌दे का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ लेने के लिए ही करते रहेंगे बजाय इसके कि समस्या के समाधान की दिशा में वे कोई रचनात्मक काम करें। ऐसी समस्या, जिसमें उन सब ने अलग-अलग मात्रा में योगदान दिया है।
नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड 2013 के मुताबिक महिलाओं के लिए पांच सर्वाधिक असुरक्षित राज्यों में वे राज्य शामिल हैं जहां सपा, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा का राज है। यानी कोई भी प्रमुख दल अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। उंगली उठाने में जिस पार्टी की विशेषज्ञता है और जो दिल्ली से किए अपने वादे से मुकर गई थी, उस आम आदमी पार्टी ने आरोप-प्रत्यारोप की मर्यादा सबसे पहले तोड़ी है, लेकिन जनता को अब और मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। दिल्ली पुलिस तो दुष्कर्मी को फुर्ती से पकड़कर खुद की पीठ थपथपाने में लग गई है जबकि वास्तविकता यह है कि आरोपी ड्राइवर को इसी प्रकार के अपराध के लिए पहले भी गिरफ्तार किया गया है और वह सात माह हिरासत में भी रह चुका है। फिर यह बात भी है कि दो साल पहले सारे आंदोलन के बाद भी राष्ट्रीय राजधानी में ऐसी घटनाएं थम नहीं रही हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में यदि किसी बात को ध्यान में लाने की जरूरत है तो वह उस युवा महिला की बहादुरी है, जो उन सारे नेताओं की तुलना में महिलाअों की सुरक्षा की सबसे बड़ी पैरोकार बनकर उभरी हैं, जिन्हें हम टीवी बहसों में देखते हैं, क्योंकि उसने जो किया है, उसका उन्होंने केवल वादा भर किया है। अपनी दूरदृष्टि और चरित्र-बल के आधार पर उसने दिल्ली की गलियों से एक दुष्कर्मी को बाहर निकालकर कठघरे तक पहुंचाया है। इसके लिए उसकी सराहना की जानी चाहिए। यह घटना शहर की हम महिलाओं को याद दिलाती है कि जिस हीरो की हमें जरूरत है, वह वीरांगना के रूप में हमारे बीच से ही आएंगी। रोहतक में मनचलों की पिटाई करने वाली लड़कियों ने दिखा ही दिया है कि हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी।
अद्वैता काला
पटकथा लेखिका और कथाकार
advaita0403@gmail.com