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भीतर के केंद्र से दूर ले जाता है अहंकार

6 वर्ष पहले
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परमात्मा अच्छे लोगों को अच्छे काम करने और बुरे लोगों को गलती सुधारने के मौके देता रहता है। किंतु हमारे जीवन में जब-जब अहंकार आएगा, ईश्वरीय शक्ति हमसे मुंह मोड़ लेगी। रामचरितमानस के किष्किंधा कांड में सुग्रीव, बालि की कहानी श्रीराम को सुना रहे थे, ‘अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बालि रिपु बल सहै न पारा।। धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउं बंधु संग लागा।।’ उसने आधी रात को नगर के फाटक पर आकर ललकारा। बालि शत्रु की ललकार को सह नहीं सका। वह दौड़ा, उसे देखकर मायावी भागा। मैं भी भाई के संग चला गया। बालि ने उस मायावी की चुनौती स्वीकार की और उसके पीछे दौड़ा।
उस राक्षस को मारने के लिए दौड़ने में साहस से अधिक अहंकार था। इसीलिए श्रीराम ने अहंकारी बालि का साथ न देकर विनम्र सुग्रीव का साथ दिया। अहंकार हमें अपने केंद्र से बाहर परिधि पर डाल देता है। इस घटना में सुग्रीव भाई के पीछे गए थे। हम भी हैं अहंकार के पीछे चल देते हैं। सुग्रीव इसलिए बच गए कि उनके जीवन में हनुमानजी थे। हनुमानजी एक तरह से एक ऐसी जीवनशैली हैं, जो हमारे मनोविज्ञान को इस बात के लिए प्रेरित करती हैं कि उदासी और निराशा के साथ जीना नहीं सीखना है, उसे मिटाना है और यह काम योग द्वारा हो सकता है।
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