सम्राट वायुसेन को उनके राज ज्योतिषी ने अंधविश्वासी बना दिया था। बिना मुहूर्त देखे वे कोई काम नहीं करते थे। प्रजाहित में जल्दी किए जाने वाले काम भी ज्योतिषी के मना करने पर टाल देते। इस कारण प्रजा बड़ी हैरान-परेशान होती। एक बार पड़ोसी राजा ने आक्रमण किया, तो राज ज्योतिषी ने मुहूर्त न होने का कारण देकर जवाबी हमला रोक दिया। परिणामस्वरूप शत्रु सेना नगर में घुस आई और तबाही मचा दी। बुद्धिमान सेनापति के अथक प्रयासों से हार को जीत में बदला जा सका। सभी सभासद सम्राट को इस ज्योतिषी के पाखंड से मुक्त कराना चाहते थे, किंतु कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। एक दिन सम्राट वायुसेन राज ज्योतिषी के साथ नगर भ्रमण पर निकले।
मार्ग में एक किसान कंधे पर हल रखे खेतों की ओर जाता दिखाई दिया। उसे देखकर राज ज्योतिषी ने कहा, ‘अरे मूर्ख! तू, जिस दिशा में जा रहा है वह अशुभ है। उधर मत जा।’ किसान विनम्रता से बोला, ‘मैं तो माह के तीसों दिन इसी दिशा में जाता हूं, क्योंकि मेरे खेत इधर ही हैं। यदि आपकी बात सही है तो मेरा तो अब तक सर्वनाश हो गया होता।’ राज ज्योतिषी, किसान के सटीक उत्तर से झेंप गया और बोला, ‘तेरी हस्तरेखा प्रबल होगी, इसलिए तू बचा हुआ है। ला, अपना हाथ दिखा।’ तब किसान ने कहा, ‘जिन हाथों से मेहनत कर अपनी रोटी कमाता हूं, उन्हें आपके सामने क्यों फैलाऊं? मुझे क्षमा कीजिए और अपना काम करने दीजिए।’ यह कहकर किसान अपने रास्ते चला गया, किंतु सम्राट को राज ज्योतिषी के अनावश्यक भ्रमजाल से मुक्त कर गया। उस दिन से सम्राट ने कर्म को प्रधान मानकर भाग्य को ईश्वर पर छोड़ दिया। कर्म में विश्वास रखना श्रेयस्कर है, क्योंकि परिश्रम का फल सदैव मीठा होता है।