हिंदी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी अत्यंत सरल स्वभाव के थे। वे जिस युग में हुए, वह युग सामाजिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ था। समाज में अंधविश्वास, जाितभेद, छुआछूत चरम पर थे। उच्च वर्ण के लोग इन बातों में विश्वास करते थे और कड़ाई से ऐसे सभी नियमों का पालन करते थे। आचार्य द्विवेदी उच्च कुलोत्पन्न होने के बावजूद उसके अहंकार से मुक्त थे। इसके अलावा वे ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक भी थे। यह उस जमाने की सर्वश्रेष्ठ व प्रतिष्ठित पत्रिका थी, लेकिन उन्हें इसका भी कोई अभिमान नहीं था। वे सभी को मनुष्य की दृष्टि से देखते थे और तदनुकूल सभी से समान व्यवहार करते थे। एक दिन आचार्य द्विवेदी अपने खेत से घर लौट रहे थे। अचानक उन्हें एक स्त्री की चीख सुनाई दी। वे दौड़कर उसके पास पहुंचे। वह एक निम्न वर्ण की अछूत स्त्री थी, जिसे सांप ने काट लिया था।
वह अचेत होने को ही थी कि आचार्य द्विवेदी ने अपना जनेऊ तोड़ा और उसके शरीर के उस स्थान को जहां सांप ने काटा था, जनेऊ से बांध दिया। फिर चाकू से उस स्थान को चीरकर जहरीला रक्त निकाल दिया। वह स्त्री सचेत हो गई। गांव के सभी लोग इकट्ठे हो गए। उन लोगों में जो पंडित थे, उन्होंने जनेऊ तोड़ने के लिए आचार्य द्विवेदी को खूब कोसा। जनेऊ जैसी पवित्र चीज को अछूत के लिए तोड़ने का काम उनकी दृष्टि में बहुत बड़ा अपराध था, किंतु आचार्य द्विवेदी ने यह कहकर सभी की बोलती बंद कर दी, ‘मैंने एक इंसान के प्राण बचाए हैं, जो मेरा परम धर्म है।’ उच्च वर्ण या जाित का मिथ्याभिमान इंसानियत से दूर कर देता है, जो मनुष्य का सर्वोपरि धर्म होता है। अत: स्वयं को ऐसे अहंकार से मुक्त रखकर समभाव और सहभाव में स्थित रहना चाहिए।