एक बंजारा बैलों पर मिट्टी लादकर दिल्ली आ रहा था। रास्ते में पड़ने वाले गांवों में उसकी मुल्तानी मिट्टी का आधा हिस्सा बिक गया। बोरे आधे खाली होने सेे बैलों की पीठ पर टिक नहीं पा रहे थे। तब बंजारे ने नौकरों से कहा, ‘बोरों के एक तरफ बालू रेत भर लो। हम अभी राजस्थान की जमीन पर खड़े हैं। यहां तो हर ओर रेत है।’ आगे चलते हुए इस काफिले को दिल्ली का व्यापारी मिला। उसने कहा, ‘तुम लोग मूर्ख हो। बैलों को व्यर्थ ही कष्ट दे रहे हो। रेत फेंककर मिट्टी आधा-आधा कर बैलों पर रखो। कम भार होने से बैल तेज चलेंगे।’ तब बंजारे ने व्यापारी से परिचय पूछा। उसने बताया, ‘मुझे व्यापार में घाटा हुआ। अब पास में कुछ नहीं रहा, तो घर लौट रहा हूं।’ यह सुनते ही बंजारे ने एक असफल व्यक्ति की राय से चलने के स्थान पर अपने अनुभव को वरीयता दी।
दिल्ली पहुंचकर उसने मुल्तानी मिट्टी और रेत के अलग-अलग ढेर लगवाए और मिट्टी बेचनी शुरू कर दी। उसी समय बादशाह अस्वस्थ हुआ। वैद्य ने उसे रेत के टीले पर रहने की सलाह दी, क्योंकि रेत शरीर को निरोग कर देती है। बादशाह के एक कारिंदे ने बंजारे को रेत लाते देखा था। उसने वही रेत खरीदने का सुझाव दिया। बादशाह के कारिंदों ने सारी रेत ऊंचे दामों में खरीद ली। बंजारा मालामाल हो गया। जीवन में सदैव अनुभव के आधार पर निर्णय लेना चाहिए, क्योंकि अनुभव की आंच में तपकर बुद्धि विवेक का रूप ग्रहण कर लेती है और विवेक उचित-अनुचित का दिशा बोध देता है।