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क्या मौत पर जीने के शौकीन हैं डॉक्टर और सरकार?

वार्ताएं बेनतीजा हो रही हैं। बीमार चेहरों की चीखें कोई नहीं सुन रहा। मांगें मानव जीवन पर भारी पड़ रही हैं।

लक्ष्मी प्रसाद पंत | Last Modified - Nov 11, 2017, 04:12 AM IST

क्या मौत पर जीने के शौकीन हैं डॉक्टर और सरकार?
महत्व, उम्मीद और अस्तित्व के हिसाब से कभी डॉक्टरों की अनदेखी नहीं की जा सकती है। डॉक्टर होने के भी अपने मायने हैं। सबसे सभ्य, शिष्ट और मानवता की सबसे संवेदनशील इकाई डॉक्टर ही तो होते हैं। यूं ही तो इन्हें ईश्वर का दर्जा नहीं मिला। लेकिन कैसी अजीब विड़ंबना है...मरीजों की नब्ज थामकर मर्ज का इलाज करने वाले ये ईश्वर पिछले पांच दिन से बीमारों को चुपचाप मरते देख रहे हैं। सरकार भी कम कठोर नहीं है। वार्ताएं बेनतीजा हो रही हैं। बीमार चेहरों की चीखें कोई नहीं सुन रहा। मांगें मानव जीवन पर भारी पड़ रही हैं।

इलाज न करने की अघोषित हड़ताल पांच दिन से जारी है। सभी मांगें मानने के बाद भी डॉक्टर्स सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रहे। क्या यह सियासत है? या दोनों ओर के वार्ताकारों की भारी नाकामयाबी। दोनों के दिल और धड़कनें बंद सी हैं। मांगें मानें या नहीं, क्या मुमकिन है क्या नामुमकिन? इस पर बहस हो सकती है और होनी भी चाहिए लेकिन मरीजों की मौत की शर्त पर नहीं। अफसोस... लेकिन यही हो रहा है। मरीजों के साथ साजिश हो रही है। वर्तमान और आगे होने वाली हड़तालें इसी साजिश की लंबी कड़ियां हैं। पूरी व्यवस्था का यह चाल और चेहरा बेचैनी पैदा करता है।

हड़ताल कब खत्म होगी? इस सवाल का जवाब न डॉक्टरों के पास है, न सरकार के। सरकार सहजता और स्वच्छता से सारी मांगें मानने का दावा कर रही है जबकि डॉक्टर्स उस सही नब्ज को नहीं पकड़ पा रहे हैं जो हड़ताल को सही इलाज की ओर ले जाए। इधर रेस्मा के तहत गिरफ्तारियां शुरू हो गई हैं। हालात और बिगड़ सकते हैं। स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही बीमार हैं। जो कुछ ठीक था उसे हड़ताली डाक्टर अपहरण कर भूमिगत हो गए हैं।

बहरहाल, जीवन जैसे थम सा गया है। मरीजों की पहली जरूरत इलाज है। उन्हें मिलना चाहिए। हड़ताल खत्म होनी चाहिए। चाहे सख्ती से या सियासी गणित से। वरना संदेश यही जाएगा कि चाहे डॉक्टर हों या सरकार, दोनों ही मौत पर जीने के शौकीन हैं।
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