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भाइयों ने पेश की प्रेम की मिसाल

8 वर्ष पहले
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एक किसान के दो पुत्र थे। बड़े पुत्र के तीन बच्चे थे और छोटे के यहां कोई संतान नहीं थी। किसान ने यह सोचकर कि मेरी मृत्यु के बाद संपत्ति को लेकर दोनों भाइयों में कोई विवाद न हो, दोनों बेटों में बराबरी से जमीन और धन का बंटवारा कर दिया। किसान जब मृत्यु को प्राप्त हुआ, तो उसके मन में अपार संतोष था कि दोनों बेटे प्रेम से रहेंगे और हुआ भी यही।

किसान के दोनों पुत्रों में पिता की मृत्यु के बाद कोई विवाद नहीं हुआ। दोनों अपने-अपने खेत में खूब परिश्रम करते और मन में यही भावना रहती कि मैं भले ही कष्ट उठा लूं, किंतु मेरे भाई को कोई परेशानी न हो। एक साल दोनों भाइयों के खेत में खूब धान उपजी। दोनों के खलिहान भर गए। धान की रक्षा के लिए दोनों खलिहान पर ही सोते थे। एक रात को बड़े भाई के मन में विचार आया कि मैं कितना स्वार्थी हूं। बड़े ही आराम से खाता-पीता हूं और अपने परिवार की देखरेख में छोटे भाई को देखना भूल ही जाता हूं। मेरे तो बच्चे हैं, जो कुछ वर्षों में जवान होकर कमाने लगेंगे, किंतु छोटे की तो संतान ही नहीं है। मुझे अपनी धान में से कुछ उसे देना चाहिए।

यह सोचकर वह कुछ बोरे धान छोटे भाई के खलिहान में चुपचाप रख आया। उधर छोटे भाई ने स्वयं को मतलबी सोचते हुए विचार किया कि मैं तो संतानहीन हूं। बड़े भाई के तीन बच्चे हैं। मुझे अपनी धान में से उन्हें कुछ देना चाहिए। वह भी कुछ बोरे भाई के खलिहान में रख आया। सुबह दोनों ने देखा कि उनके संग्रह में से धान कम नहीं हुई। दोनों हैरान थे। अगली रात दोनों फिर खलिहान में धान रखने के विचार से निकले, लेकिन दोनों ने एक-दूसरे को देख लिया। दोनों एक-दूसरे के भाव जान गए और स्नेह से लिपट गए। अपने स्वार्थों को छोड़कर एक-दूसरे का अधिक से अधिक ध्यान रखने का भाव संबंधों में स्नेह की ऊष्मा बनाए रखता है और यही भाव संबंधों को स्थायी भी बनाता है।