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साल की शुरुआत में संसदीय बैठकों का कैलेंडर जारी हो

सरकार का रवैया देखकर लगता है कि इस वर्ष सत्र दिसंबर के दूसरे हफ्ते से पहले शुरू नहीं हो पाएगा।

Danik Bhaskar | Nov 25, 2017, 08:40 AM IST

इस वर्ष केंद्र सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र की अब तक घोषणा नहीं की है, जबकि पिछले कुछ वर्षों में शीतकालीन सत्र आमतौर पर नवंबर के तीसरे-चौथे सप्ताह में शुरू होकर दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक चला करता था। सरकार का रवैया देखकर लगता है कि इस वर्ष सत्र दिसंबर के दूसरे हफ्ते से पहले शुरू नहीं हो पाएगा। जाहिर है चर्चा का विषय भी बहुत कम मिलेगा।
आज़ादी के पूर्व संविधान सभा की बैठक में डॉ. आम्बेडकर ने संसदीय प्रणाली की सरकार को अपनाने के पक्ष में तर्क दिया था कि संसदीय प्रणाली में सरकार की उसकी नीतियोें की समीक्षा और उसकी जवाबदेही बेहतर तरीके से तय की जा सकती है। यानी संसद की बैठकें नियमित होनी चाहिए और सरकार के कार्यों की समीक्षा कर उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। आज़ादी के बाद शुरुआती दिनों में संसद की बैठकें आमतौर पर सालाना 125-140 दिन होती थी परंतु पिछले कुछ दशकों में सालाना औसत सिर्फ 65-70 दिन हो गया है। संसद का अधिवेशन बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति को है, लेिकन ऐसा वह प्रधानमंत्री की सलाह पर ही कर सकता है। सवाल है कि इस समस्या का समाधान कैसे किया जाए? साल की शुरुआत में ही संसदीय बैठकों का वार्षिक कैलेंडर जारी किया जाए, ताकि सांसदों को संसदीय कार्यवाही और अन्य कार्यों में संतुलन बनाने का मौका मिल सके। ब्रिटिश संसद वार्षिक अधिवेशन के फॉर्मूले पर कार्य करती है। इसी प्रकार हम भी संसद के पांच वर्ष के कार्यकाल में पांच वार्षिक अधिवेशन रख सकते हैं। यदि सांसदों का एक समूह अधिवेशन बुलाने का आग्रह करे तो भी अधिवेशन बुलाने का प्रावधान हो सकता है। संसदीय कार्यवाही के लिए साल में न्यूनतम 120 दिन तय कर दिए जाएं।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसदीय बहस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और किसी भी कारण से इसका न होना राष्ट्र के लिए चिंता का विषय होता है। वर्तमान घटनाओं को देखते हुए यह अत्यंत आवश्यक है कि संसदीय कार्यवाही से जुड़े कुछ नियमों में उचित बदलाव किए जाएं ताकि केंद्र और राज्यों की संसदें अपना कामकाज सुव्यवस्थित रूप से कर सकें।

शशांक रजक, 23
आईआईटी, खड़गपुर
facebook: @Shashank.rajak1