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तकाजा सीबीआई की स्वतंत्रता का

8 वर्ष पहले
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हमारा संवैधानिक लोकतंत्र बहुमत के साथ-साथ विधि के शासन के सिद्धांत पर भी आधारित है। संसदीय बहुमत से सरकारें बनती हैं, लेकिन वे वैधानिक व्यवस्था के तहत चलती हैं। यूपीए सरकार अगर संविधान की इस मूल स्थापना के प्रति जागरूकता एवं संवेदनशीलता का परिचय दे तो उसके सामने पारदर्शिता, सार्वजनिक जीवन की स्वच्छता एवं कानून के विश्वसनीय अमल की दिशा में कदम उठाने का बेहतरीन मौका है।

इसका सदुयपोग कर केन्द्र सरकार उन लांछनों से काफी हद तक उबर सकती है, जिन्होंने उसके लिए न्यायिक एवं राजनीतिक मुसीबत पैदा कर रखी है। कोयला खदान आवंटन मामले की सीबीआई जांच की स्थिति रिपोर्ट में फेरबदल का मुद्दा केन्द्र सरकार के गले की फांस बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर है कि स्थिति रिपोर्ट का दिल ही बदल दिया गया। रिपोर्ट में ऐसे बदलाव हुए, जिससे उसका मूल स्वरूप प्रभावित हुआ।

सर्वोच्च न्यायालय की यह चिंता पूर्णत: वैध है कि सीबीआई पिंजरे में बंद तोते की तरह हो गई है, जो उतना ही बोलती है जितना उसके आका उसे सिखाते हैं। अत: सीबीआई की स्वंतत्रता का मुद्दा फिर से सर्वोच्च न्यायपालिका की कार्यसूची में प्रमुख हो गया है, जो सार्वजनिक चर्चाओं में पहले से ही अहम बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने अब पूछा है कि क्या सीबीआई को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए कानून बनाने का इरादा सरकार रखती है?

न्यायमूर्ति आरएम लोधा, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की खंडपीठ ने कहा कि कोयला घोटाले पर सुनवाई की अगली तारीख- दस जुलाई- से पहले ऐसा कानून बनता है, तो उन्हें प्रसन्नता होगी। खंडपीठ ने परोक्ष रूप से यह सुझाव भी दिया है कि सरकार चाहे तो अध्यादेश जारी कर ऐसी कानूनी व्यवस्था तुरंत कर सकती है। यानी संसद के सत्र का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है।

अदालत ने कहा कि जिस रोज ये कानून बनेगा, वह एक सुनहरा दिन होगा। इस राय से शायद ही कोई असहमत हो। समस्या यह है कि सत्ताधारी दल- चाहे वो कोई भी हो- सीबीआई को सरकारी शिकंजे से मुक्त नहीं करना चाहते। लेकिन संसदीय बहुमत के आधार पर वैधानिक तकाजे को धता बताने की वो परंपरा अब टूटनी चाहिए।