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डाउनलोड करेंगांधीजी ने 1921 में अंग्रेजों के विरुद्ध ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ चलाया। अंग्रेजों और उनकी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। आंदोलन देश भर में फैल गया था। बनारस की घटना है। आंदोलन से विद्यार्थी भी अछूते न रहे। एक दिन बनारस में कुछ विद्यार्थी ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हुए जुलूस की शक्ल में जा रहे थे। उनका नेतृत्व एक पंद्रह वर्षीय छात्र चंद्रशेखर कर रहा था।
देशभक्ति के जोश से भरे इन युवकों के सामने अचानक पुलिस आ गई और सभी को हथकड़ी लगाकर अदालत ले गई। चूंकि नेता चंद्रशेखर था, इसलिए सर्वप्रथम पूछताछ भी उसी से हुई। चंद्रशेखर से जज ने पूछा-‘तुम्हारा नाम क्या है?’ चंद्रशेखर ने निर्भीकता से जवाब दिया-‘आजाद।’
अगला प्रश्न जज ने किया-‘तुम्हारे पिता का नाम क्या है?’ चंद्रशेखर ने गर्व से सिर उठाकर कहा- ‘स्वतंत्र।’ जज ने झुंझलाकर इस बार पूछा- ‘तुम्हारा घर कहां है?’ चंद्रशेखर ने बिना डरे कहा- ‘जेल।’ अब तो जज आपे से बाहर हो गया। उसने चंद्रशेखर को बेंत लगाने का आदेश दिया। पुलिस ने बेंत मार-मारकर चंद्रशेखर को लहूलुहान कर दिया, किंतु वह ‘भारत माता की जय’ बोलता रहा। अंतिम बेंत के बाद वह बेहोश हो गया।
जब होश आया, तो चोट की कोई परवाह किए बगैर ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाकर घर की ओर चल दिया। उसके साहस और देश भक्ति के जज्बे की सराहना स्वरूप उसका नागरिक अभिनंदन किया गया। आगे चलकर उसी चंद्रशेखर आजाद ने देश को स्वतंत्र कराने में अप्रतिम योगदान दिया। जब मन में अच्छे उद्देश्यों के लिए समर्पण भाव प्रबल हो, तो तन हर कष्ट सह जाता है। राष्ट्र के संदर्भ में यह आत्म बलिदान की अंतिम सीमा तक जाता है।
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