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डाउनलोड करेंराजनीति और पत्रकारिता के बीच पनप रहे सियासी गठबंधन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। समाज हक्का-बक्का है और राजनीतिक दलों के प्रति पत्रकारों की वफादारी से हैरान भी। दर्शक, पाठक और श्रोता एक अज्ञात भय से ग्रस्त हैं। चिंताएं ये हैं कि राजनीति की कुटिल चालों के शिकंजे में यदि काली स्याही भी फंस गई तो सच और उसके सरोकारों को कौन जिंदा रखेगा। बेलाग-बेदाग सवाल आखिर उठाएगा कौन?
इन दिनों पत्रकार पार्टियां जॉइन कर रहे हैं। पहले भी करते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्हें जवाब देना पड़ रहा है। ऐसे प्रश्नों के जवाब में चतुर तर्क यह है कि यह फैसला निजी राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं, बल्कि राजनीति का मुहावरा बदलने के लिए है। सियासी दोस्ती के इन नए रूपक-उपमाओं के उलट सवाल यह है कि क्या भूमिकाएं बदलने से बदलाव हो सकते हैं? सत्ता के साथ साझेदारी पत्रकारिता के पेशे के प्रति ईमानदारी कैसे हो सकती है?
सियासत में आना गलत नहीं है। पत्रकार भी वोटर है, किसी सियासी दल का शैदाई हो सकता है। लेकिन अगर यदि आप संपादक है, चैनल हैड हैं या राजनीतिक पत्रकार-विश्लेषक हैं, तो पहली जिम्मेदारी निष्पक्षता की है। परंतु यह निष्पक्षता तब सवालों के घेरे में आती है जब आप पत्रकारिता छोड़ राजनीतिक दल जॉइन कर लेते हैं। जाहिर है कि आपने अपने राजनीतिक झुकाव का पत्रकारिता में जाने-अनजाने इस्तेमाल किया ही होगा। निजी राजनीतिक उद्देश्य के लिए खबरें बनाईं और चलाईं होंगी। जिन प्रश्नों का उत्तर आप एक पत्रकार के तौर पर दे सकते हैं, सियासी दल में शामिल होने के बाद आपका हर बयान-तर्क सियासी ही होगा, क्योंकि राजनीति और राजप्रासाद आपको सियासी वफादारी के लिए ही मिला है।
पत्रकार रहते राजनीतिक पार्टियों के प्रति वफादारी भी पेड न्यूज ही है। पार्टी का प्रवक्ता, राजनीतिक-मीडिया सलाहकार बनना, किसी खास सत्तासीन दल के निगम, आयोग का अध्यक्ष कोई यूं ही नहीं बना देता। जाहिर है कि लक्ष्मण-रेखा लांघी गई होगी। राजनीतिक महत्वाकांक्षा, दल और व्यक्तियों के प्रति भावुकता ही सियासत के जादुई कालीन पर बैठने के मौके उपलब्ध कराती है। यह शुद्धअवसरवादी सोच है।
पत्रकारिता दरअसल, सिर्फ खबर नहीं बताती उसके अर्थ भी ढूंढ़ती है। मानवीय प्रतिबद्धता पत्रकारिता का बीजगणित है। पत्रकार भ्रष्ट शासन-प्रशासन की कुर्सी के नीचे बारूदी सुरंग की तरह काम करता है। सियासी प्रलोभन और प्रशस्ति इस धार को कमजोर करते हैं। चौथा स्तंभ अगर पहले स्तंभ के चुंबकीय आकर्षण में खिंचता रहा तो पत्रकारिता के खरेपन की बुनियाद हिलने लगेगी। पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में जाकर पूरे सिस्टम को बदलने की सोच बेतुके और बेलिबास सवाल की तरह है। और हमारी बेचैनी तो यह कि जो लोग मिली हुई चुनौतियों को छोड़कर नई भूमिकाएं तलाशते हैं, उनके सपने भले ही बड़े और भव्य हों, लेकिन वे कभी पूरे नहीं होते।
लेखक दैनिक भास्कर, राजस्थान के स्टेट एडिटर हैं।
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