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दिल्ली की विरासत सहेजने के नाम पर धोखा

7 वर्ष पहले
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शहरी विकास मंत्रालय ने नई दिल्ली के लुटियन्स बंगलो जोन में 516 बंगले गिराकर फिर बनाने का प्रस्ताव दिया है। इन सारे बंगलों में न्यायपालिका व कार्यपालिका के उच्च पदाधिकारी और सेना के अफसर रहते हैं। फिलहाल 78 करोड़ रुपए की लागत से 29 बंगलों का पुनर्निर्माण होगा। शेष का पुनर्निर्माण चरणबद्ध तरीके से 20 साल की अवधि में होगा। लागत आएगी 3000 करोड़ रुपए।

दूसरा फैसला यूनेस्को को दिल्ली को विश्व विरासत का दर्जा देने का प्रस्ताव भेजने का है। इस पर विशेषज्ञों की एक समिति काम करती रही है। सब कुछ ठीक हुआ तो दिल्ली को 2015 तक यह दर्जा मिल जाएगा। प्रस्ताव में नई दिल्ली भी शामिल है। यही मजेदार बात है।

दुनियाभर में सौ-सवा सौ साल पुरानी इमारतें ही हेरिटेज में शामिल की जाती हैं। नई दिल्ली में ब्रिटिश जमाने के पहले के खंडहर छोड़ दें तो कोई इमारत इतनी पुरानी नहीं है। फिर इमारतों का आर्किटेक्चर व इतिहास की दृष्टि से भी महत्व होना चाहिए। नई दिल्ली की स्थापना 1931 में हुई थी। 13 फरवरी को यह 83 साल की हो जाएगी। किसी बसाहट को शहर का रूप लेने के लिए एक सदी तो लग ही जाती है। नई दिल्ली को लेकर ऐसी सोच नहीं थी। यह तो ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति का प्रतीक थी और आज राजनीतिक शक्ति की खोखली प्रतीक भर है। यहां अपनी कोई आबादी नहीं है। मंत्री, अफसर, न्यायपालिका के सदस्य आदि यहां अपना कार्यकाल पूरा होने तक रहते हैं। आज तक नई दिल्ली ने भारी-भरकम रिपोर्टों के अलावा कुछ पैदा नहीं किया है। इसका कोई कामकाजी वर्ग नहीं है, कोई उद्योग नहीं, कोई थोक बाजार नहीं, न नई दिल्ली का कहलाने वाला कोई खास व्यंजन, न खाने-पीने के परंपरागत ठिकाने हैं। यानी ऐसे कोई सांस्कृतिक प्रतीक नहीं हैं, जो इस बसाहट को शहर का दर्जा दे सकें।

हेरीटेज का मामला तो और भी खोखला है। ख्यात वास्तुकार लुटियन्स ने केवल चार बंगले डिजाइन किए थे। उनके नाम पर जिन बंगलों को संरक्षित करने के प्रयास हो रहे हैं वे तो उनके मातहतों ने बनाए थे। विरासतों के पुनर्निर्माण में उसी सामग्री, उन्हीं औजारों और उसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जो मूल इमारत में किया गया था। पर इन बंगलों में तो ऐसी अत्याधुनिक सुविधाएं जुटाई जानी हैं, जो मूल रचना में थी ही नहीं। निश्चित ही 3000 करोड़ रुपए की लागत आने वाले बरसों में और बढ़ेगी, क्योंकि रुपए की कीमत गिरती जा रही है।

अब इन दो प्रस्तावों के विरोधाभास को आप क्या कहेंगे? एक तरफ तो यूनेस्को से गुहार लगाई जा रही है कि लुटियन्स जोन को विश्व विरासत का दर्जा दिया जाए ताकि वहां की पुरानी इमारतों को संरक्षित रखा जा सके। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार का ही एक अन्य विभाग बड़ी-बड़ी निर्माण कंपनियों को वहां आमंत्रित कर रहा है कि वे वहां खुदाई आदि करके पूरे लुटियन्स जोन का नवनिर्माण कर दें। इसे यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि सरकार के दायें हाथ को नहीं मालूम की बायां हाथ क्या कर रहा है। यह धोखाधड़ी का मामला ज्यादा लगता है।

लेखक दिल्ली स्थित इतिहासकार हैं