रोमन हिंदी के बारे में क्या ख्याल है? / रोमन हिंदी के बारे में क्या ख्याल है?

देवनागरी की बजाय रोमन लिपि अपनाकर हिंदी भाषा को दिया जा सकता है वैश्विक रूप।

Bhaskar News

Jan 08, 2015, 05:20 AM IST
Chetan bhagat Bhaskar hamare columnist
हमारे भारतीय समाज में हमेशा चलने वाली एक बहस हिंदी बनाम अंग्रेजी के महत्व की रही है। वृहद स्तर पर देखें तो इस बहस का विस्तार किसी भी भारतीय भाषा बनाम अंग्रेजी और किस प्रकार हमने अंग्रेजी के आगे स्थानीय भाषाओं को गंवा दिया इस तक किया जा सकता है। यह राजनीति प्रेरित मुद्‌दा भी रहा है। हर सरकार हिंदी के प्रति खुद को दूसरी सरकार से ज्यादा निष्ठावान साबित करने में लगी रहती है। नतीजा ‘हिंदी प्रोत्साहन’ कार्यक्रमों में होता है जबकि सारे सरकारी दफ्तर अनिवार्य रूप से हिंदी में सर्कुलर जारी करते हैं और सरकारी स्कूलों की पढ़ाई हिंदी माध्यम में रखी जाती है।

इस बीच देश में अंग्रेजी लगातार बढ़ती जा रही है। बिना प्रोत्साहन कार्यक्रमों और अभियानों के यह ऐसे बढ़ती जा रही है, जैसी पहले कभी नहीं बढ़ी। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि इसमें कॅरिअर के बेहतर विकल्प हैं, समाज में इसे अधिक सम्मान प्राप्त है और यह सूचनाओं व मनोरंजन की बिल्कुल नई दुनिया ही खोल देती है तथा इसके जरिये नई टक्नोलॉजी तक पहुंच बनाई जा सकती है। जाहिर है इसके फायदे हैं।

वास्तविकता तो यही है कि अंग्रेजी की सरसरी समझ के बिना आप एक मोबाइल फोन या साधारण मैसेजिंग एप भी उपयोग में नहीं ला सकते। हिंदी को चाहने वाले और इस राष्ट्रभाषा में शुद्धता को बनाए रखने के हिमायतियों के दुख को समझा जा सकता है, जब वे देखते हैं कि युवा अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करता है और अंग्रेजी की दुनिया में जितनी जल्दी हो सके, प्रवेश पाना चाहता है। वे हिंदी को जितना थोपते हैं, उतना यह युवा उसके खिलाफ विद्रोह करता है। ऐसे में हिंदी प्रेमी (मैं भी उनमें शामिल हूं) को क्या करना चाहिए? और हम सब हिंदी को बचाने के लिए क्या कर सकते हैं कि युवा वर्ग को यह बोझ या दायित्व भी न लगे और वे इसे स्वप्रेरणा से अपना लें?

इसका समाधान यह है कि हम रोमन लिपि को अपना लें। रोमन लिपि में लिखी हिंदी हिंग्लिश नहीं होगी। यह हिंदी भाषा ही होगी, बस देवनागरी लिपि की बजाय एंग्लो सेक्सन लिपि में लिखी होगी। उदाहरण के लिए ‘aap kaise hain?’ यानी देवनागरी में लिपि कहें तो ‘आप कैसे हैं?’ यानी यह सिर्फ रोमन लिपि में लिखा गया वाक्य है, जिसमें अंग्रेजी लिखी जाती है।
रोमन लिपि को अपनाना महत्वपूर्ण क्यों है? इसका जवाब यह है कि यह एंग्लो सेक्सन लिपि सर्वव्यापी है। यह कम्प्यूटर की-बोर्ड और मोबाइल फोन के टच स्क्रीन पर मौजूद है। यह पहले ही काफी लोकप्रिय हो चुकी है खासतौर पर युवाओं में। मसलन, लाखों भारतीय मोबाइल एप का इस्तेमाल करते हैं, जिसे वाट्सएप कहते हैं। इस पर ज्यादातर बातचीत हिंदी में होती है, लेकिन रोमन लिपि के माध्यम से। इसके पहले एसएमएस में भी यही लिपि हावी रही थी।

यह सही है कि देवनागरी में डाउनलोड उपलब्ध है, लेकिन थोड़े ही लोग उनका उपयोग करते हैं। सच तो यह है कि फोन पर देवनागरी की-बोर्ड ट्रांसलिटरेशन का उपयोग करते हैं यानी पहले आप रोमन हिंदी में टाइप करें और फिर सॉफ्टवेयर उसे देवनागरी हिंदी में बदल देता है। दूसरे शब्दों में उपयोगकर्ता अभी भी रोमन हिंदी का ही उपयोग कर रहा है। हिंदी फिल्म जगत के पोस्टरों और विज्ञापन जगत में रोमन हिंदी पहले ही से ही प्रचलन में हैं। ज्यादातर हिंदी फिल्मों की पटकथाएं आज रोमन हिंदी में ही लिखी जाती हैं। आप किसी भी बड़े शहर में चले जाइए आपको ऐसा होर्डिंग जरूर देखने को मिलेगा, जिस पर लिखा संदेश रोमन लिपि में लिखी हिंदी में होगा। विज्ञापनों में रोमन हिंदी का चलन बढ़ता जा रहा है।

किंतु लगता है कि हिंदी के विशेषज्ञ, शुद्धतावादी और हिंदी के हिमायती या तो इस सब से वाकिफ नहीं हैं या उसकी अनदेखी कर रहे हैं। उन्हें हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि में कोई फर्क नज़र नहीं आता, जबकि लिपि सिर्फ भाषा की अभिव्यक्ति का लिखित माध्यम है। लोगों को आज भी हिंदी भाषा से प्रेम है। बस बात इतनी है कि आज की आधुनिक, टेक्नोलॉजी से संचालित जिंदगी में वे देवनागरी लिपि को अपना नहीं पा रहे हैं। हम हिंदी भाषा में रोमन लिपि के इस्तेमाल को वैधता प्रदान कर हिंदी भाषा को बचा सकते हैं।
राष्ट्र को एकजुट करने में इसका जबर्दस्त प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि इससे अंग्रेजी और हिंदी भाषी निकट आएंगे। साझी लिपि होगी तो अन्य क्षेत्रीय भाषाएं भी एक-दूसरे से और अंग्रेजी से अधिक जुड़ सकेंगी। उदाहरण के लिए यूरोप में एक दर्जन भाषाएं प्रचलन में हैं, किंतु उनकी लिपि समान है। यूरोपीय एकीकरण में इसकी अपनी भूमिका है। इंडोनेशिया और मलेशिया में स्थानीय लिपि बहुत पहले ही विदा हो चुकी हैं। उन्होंने अपने भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपना ली है।

निश्चित ही हिंदी के शुद्धतावादी नहीं चाहेंगे कि देवनागरी की जगह रोमन लिपि का उपयोग किया जाए। वे हिंदी को जैसी वह आज है यानी देवनागरी लिपि में ही संरक्षित रखना चाहते हैं। परंतु वे यह भूल जाते हैं कि भाषाएं समय के साथ रूपांतरण सहित विकसित होती हैं। आज हम वैश्वीकरण के जिस युग में रह रहे हैं, उसमें यदि हम वैश्विक लिपि अपनाते हैं तो हम हिंदी का बहुत भला करेंगे। यदि वैश्विक स्तर पर उपलब्ध लिपि होगी तो हम दुनिया के अन्य हिस्सों के लोगों को हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। भूतकाल में भी उर्दू के कई शायरों ने व्यापक स्वीकार्यता के लिए अपनी उर्दू शेर-ओ-शायरी परंपरागत उर्दू लिपि की बजाय देवनागरी लिपि में प्रकाशित की हैं। यह हुई तब की बात और आज की जरूरत यह है कि हम हिंदी को एक नए स्वरूप में अपडेट करें।

हम कुछ सरकारी सूचनाओं और सार्वजनिक संकेतों को रोमन लिपि में देकर शुरुआत कर सकते हैं और उसे मिल रहे लोगों के प्रतिसाद का आकलन कर सकते हैं। फिर इसमें व्यावसायिक अवसर भी मौजूद हैं। रोमन हिंदी प्रिंट मीडिया और किताबों का नया व्यवसाय निर्मित कर सकते हैं। लाखों लोग पहले से ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। सिर्फ अब तक इस संभावना का किसी ने दोहन नहीं किया है।
वैश्विक स्तर पर प्रचलित और भाषा को समान स्तर पर पहुंचाने वाली लिपि को वैधता प्रदान करना हिंदी भाषा के लिए अच्छा ही होगा, अन्यथा उसके सामने अंग्रेजी के आक्रमण के आगे हाशिये पर जाने का जोखिम बना रहेगा। आइए, भाषा को शुद्धतावादी दृष्टिकोण से न देखें बल्कि इस तरह से देखें कि वह अपने समय के अनुकूल बनने के लिए गतिशील व रूपांतरित होने वाली विधा है। भाषाएं ऐसे ही जिंदा रहती हैं। Waqt ke saath badlna Zaroori hai. आपको यह वाक्य बिल्कुल ठीक से समझ में आ गया, नहीं?
अंग्रेजी के प्रसिद्ध
युवा लेखक
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