संपादकीय

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चीन को लुभा रही है एशिया के विकास में श्रीलंका की भूमिका

अमेरिका यूरोप की जीडीपी, आबादी, सैन्य खर्च और टेक्नोलॉजी में निवेश पर आधारित सम्मिलित शक्ति से आगे हो जाएगा।

Danik Bhaskar

Nov 23, 2017, 06:46 AM IST

अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक शक्ति में एशिया उत्तरी अमेरिका यूरोप की जीडीपी, आबादी, सैन्य खर्च और टेक्नोलॉजी में निवेश पर आधारित सम्मिलित शक्ति से आगे हो जाएगा। हाल के दशकों में चीन ने अधिक वैश्विक प्रभाव और नियंत्रण स्थापित करने के उद्‌देश्य से एशिया पर बहुत ध्यान दिया है। एशिया के छोटे राष्ट्रों के प्रति भी चीन का नज़रिया बदला है वरना पहले तो वह इन्हें रणनीतिक महत्व का समझता ही नहीं था।


इस पर बहुत चर्चा हुई है कि श्रीलंका के साथ चीन के रिश्ते इतने कैसे गहरा गए कि बीजिंग कोलंबो को आर्थिक विकास के लिए विशाल राशि कर्ज में दे रहा है। चीन जैसे बलशाली देश की रुचि श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था में इतनी कैसे बढ़ गई। वैश्विक राजनीति में हिंद महासागर क्षेत्र का हमेशा रणनीतिक महत्व रहा है। दुनिया की महाशक्तियां इसमें विशेष रुचि लेती रही हैं। इसी क्षेत्र से दुनिया का दो-तिहाई व्यापार होता है। यही वजह है कि इसे इतना महत्व दिया जाता है। रणनीतिक और व्यापारिक महत्व के अलावा यह ऊर्जा सुरक्षा प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से भी अहम है, जो इस क्षेत्र में प्रचुरता से उपलब्ध है। अत्यधिक व्यस्त रहने वाला ईस्ट-वेस्ट शिपिंग रूट श्रीलंका से सिर्फ छह से दस नॉटिकल मील दूर है, जहां से सालाना 60 हजार जहाज गुजरते हैं। ये दुनिया का दो-तिहाई कच्चा तेल, आधा कंटेनर कार्गो तथा और भी बहुत कुछ ले जाते हैं। इस प्रकार श्रीलंका पूर्व-पश्चिम के बीच समुद्री गलियारे में स्थित है, जो सिर्फ भूरणनीतिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक, सुरक्षा और नौपरिवहन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।


इसके अलावा श्रीलंका एशिया-प्रशांत क्षेत्र को जोड़ने वाली शिपिंग लेन के भी बीचोबीच स्थित है, जो दुनिया के ऊर्जा संसाधन के केंद्र माने जाने वाले मध्य पूर्व अफ्रीका के साथ भारत चीन के नेतृत्व में हो रही 21वीं सदी की आर्थिक वृद्धि का केंद्र स्रोत है। दुनियाभर के व्यापारिक सहयोगियों से कोलंबो के आदान-प्रदान की मुख्य संचालन शक्ति उसकी यही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थिति है।

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