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छंटे आशंकाओं के बादल

8 वर्ष पहले
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विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की बीजिंग यात्रा का परिणाम यह है कि भारत-चीन संबंधों को लेकर पैदा हुई आशंकाएं दूर हो गई हैं। खुर्शीद के चीन जाने का मकसद वहां के प्रधानमंत्री ली केकियांग की भारत यात्रा की तैयारियों को अंतिम रूप देना था। ली अगले रविवार को बतौर प्रधानमंत्री अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में दिल्ली आएंगे।

बीजिंग में ली ने खुर्शीद से कहा कि इस यात्रा का फैसला सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह सोच-समझकर लिया गया निर्णय है। दरअसल पिछले मार्च में जब से नए नेतृत्व ने चीन की कमान संभाली है, यह संकेत स्पष्ट शब्दों में दिया गया है कि चीन भारत के साथ अपने संबंधों को व्यापकता एवं गहराई देना चाहता है।

इसीलिए अप्रैल के मध्य में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में चीनी फौज द्वारा घुसपैठ कर तंबू गाड़ने की घटना अब तक रहस्यमय बनी हुई है। संतोष की बात है कि यह मसला कूटनीतिक माध्यमों से बातचीत के जरिये हल कर लिया गया। खुर्शीद ने कहा है कि बीजिंग में चीनी नेताओं से इस मामले पर चर्चा तो हुई, लेकिन इसका पोस्टमार्टम नहीं हुआ, बल्कि दोनों पक्षों ने संबंधों के बड़े संदर्भ पर नजर रखी।

संबंधित मुद्दों पर ली की दिल्ली यात्रा के समय अधिक ऊंचे स्तर पर ज्यादा विस्तार से बातचीत का मौका मिलेगा। भारत चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को कम करना चाहता है और चीन में ब्रrापुत्र नदी पर बन रही परियोजनाओं के बारे में अधिक जानकारी चाहता है।

स्वागतयोग्य है कि चीन ने इन दोनों ही चिंताओं को दूर करने में दिलचस्पी दिखाई है। इस बीच चीन द्वारा एक नए सीमा रक्षा सहयोग समझौते का प्रस्ताव रखा गया है, जिस पर भारत ने अपना पक्ष उसे बताया है। इस पर अब सीमा वार्ता के लिए तय दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि बातचीत करेंगे।

इन सबसे संकेत मिलता है कि ली की यात्रा के सफल रहने के लिए सकारात्मक जमीन तैयार हो गई है। इसके बावजूद इस यात्रा से किसी नाटकीय या चमत्कारिक सफलता की उम्मीद रखना उचित नहीं होगा, बल्कि यह आशा रखना ही यथार्थवादी है कि दोनों देशों में स्थापित हो चुकी वार्ता प्रक्रिया के बीच ये यात्रा एक अगला अहम कदम होगी।