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कर्नाटक में कांग्रेस राज

8 वर्ष पहले
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कर्नाटक में वैसे समय निर्णायक जीत के साथ कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई है, जब राष्ट्रीय स्तर पर उसकी संभावनाओं पर संशय गहराता गया है। दूसरी तरफ जिस समय भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में अपना रुख अति आक्रामक कर दिया है, दक्षिण भारत में बना उसका पहला किला एक तरह से क्षत-विक्षत हो गया है।

प्रशासनिक विफलताओं के कारण धूमिल छवि और पार्टी में बिखराव के कारण कमजोर संभावनाओं के साथ ही भाजपा राज्य में चुनाव मैदान में उतरी थी। लेकिन तब यह अंदाजा नहीं था कि हार इतनी जबरदस्त होगी। हालांकि इस चुनाव परिणाम के आधार पर अगले आम चुनाव के बारे में कोई संकेत नहीं प्राप्त किया जा सकता, इसके बावजूद भाजपा के ऊपर इस भारी पराजय का प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक असर अवश्य पड़ेगा।

उसके सामने यह यक्ष-प्रश्न है कि राज्यों में जड़ों से जुड़े नेता आखिर क्यों उससे अलग हो जाते हैं? जिन बीएस येदियुरप्पा की कर्नाटक में भाजपा की जड़ें जमाने में सर्व-प्रमुख भूमिका रही, उन्होंने इस चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुंचाने को अपना अकेला मकसद बना लिया। अब यह साफ है कि वे इस उद्देश्य में सफल रहे।

वैसे यह प्रश्न भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए समान रूप से प्रासंगिक है कि क्या राज्य-व्यवस्था के उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण के साथ जमीनी स्तर से उभरती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समाहित करने में वे विफल हैं और अगर ऐसा है तो उसकी वजह क्या है? कर्नाटक भी एक के बाद दूसरे कई राज्यों तक फैलती गई इस परिघटना का हिस्सा बन गया है, जिसमें उन राज्यों में चुनावी मुकाबला दो से ज्यादा दलों में विभाजित हो गया है।

स्पष्टत: यह स्थानीय आकांक्षाओं को राष्ट्रीय या स्थापित दलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने का परिणाम है। कर्नाटक में कांग्रेस, भाजपा और जेडी-एस के अलावा अब येदियुरप्पा का कर्नाटक जनता पक्ष और बीआर श्रीरामुलू की बीएसआर कांग्रेस जैसी एक क्षेत्र विशेष में प्रभावशाली शक्तियां मौजूद हैं। खैर, फिलहाल कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला है, जिससे राजनीतिक स्थिरता की संभावना उज्‍जवल हुई है। यह कांग्रेस के लिए सुनहरा मौका है। बेहतर शासन की जन-अपेक्षाओं पर खरी उतरकर वह राज्य में अपनी पुरानी जड़ों को सींच सकती है और फिर से अपनी सकारात्मक प्रासंगिकता बना सकती है।