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चुनावी माहौल में घबराहट

8 वर्ष पहले
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नरेंद्र मोदी और मुलायम सिंह यादव दोनों ने उपमाओं में उत्तरप्रदेश के गुजरात बनने का जिक्र किया, लेकिन संदेश परस्पर विरोधी था। मुलायम 2002 के गुजरात दंगों की तस्वीर खींचना चाहते थे, जबकि मोदी का मतलब था गुजरात जैसा विकास। उनमें से किसके पैगाम पर ज्यादा लोग भरोसा करेंगे, यह तो आम चुनाव के नतीजे आने पर ही पता चलेगा। फिलहाल यह साफ है कि बिहार के साथ उत्तरप्रदेश भी अगले चुनावी संग्राम का मुख्य रणक्षेत्र बन गया है। इसलिए स्वाभाविक ही है कि दिल्ली के तख्त के दावेदार इन दो प्रदेशों से अधिक से अधिक सीटें जीतने की कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे।

पिछले हफ्ते जब भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक के अंत में अपने भाषण में नरेंद्र मोदी ने खुद के पिछड़ी जाति से आने का विस्तार से जिक्र किया, तब यही माना गया कि खास तौर पर उनकी निगाह मंडल राजनीति से प्रभावित इन दो प्रदेशों पर ही है। अगर ताजा जनमत सर्वेक्षणों पर गौर करें तो कई दूसरे राज्यों के साथ-साथ इन दोनों प्रदेशों में भी मोदी का असर काम करता नजर आता है।

विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए सीएसडीएस, नील्सन और सी-वोटर एजेंसियों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों का आम निष्कर्ष है कि दोनों प्रदेशों में भाजपा सबसे बड़ा दल होकर उभर सकती है। इसके परिणामस्वरूप वह पहले के किसी आम चुनाव की तुलना में लोकसभा की सबसे अधिक सीटें जीत सकती है।

उसके नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन 220-230 सीटों तक पहुंच सकता है। उसके बाद (अगर ये अनुमान सही हुए तो) सहयोगी जुटाना शायद ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। इसलिए इस मौके पर नरेंद्र मोदी 7-रेसकोर्स रोड की तरफ बढ़ते दिखते हैं। हालांकि चुनावों में कई अगर-मगर होते हैं। फिलहाल, इनमें सबसे बड़ा सवाल आम आदमी पार्टी का प्रसार है। उसका कितना असर होगा, अभी ठोस अनुमान लगाना कठिन है। फिर उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में- जहां चार या पांच कोणों में मुकाबला होना है और बिहार में जहां तिकोना मुकाबला तय है- वोटों के प्रतिशत से सीटों का पूर्वानुमान फेल हो जाने की गुंजाइश रहती है। बहरहाल, राजनीतिक भाषणों, अटकलों और अनुमानों के बढ़ते सिलसिले के साथ चुनावी माहौल में अब खासी गरमाहट आ गई है।