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देश में अराजकता के नए पैरोकार

8 वर्ष पहले
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गणतंत्र की सच्ची संस्कृति अपने सर्वोत्तम फलों के लिए राजनीतिक दृष्टि से श्ूान्य और शिथिल युगों की आभारी है। राजनीति की आत्मिक दरिद्रता और संस्कृतियों के खोखलेपन के कारण जब-जब सुशासन पर टिकी सृजनशीलताओं का ह्रास हुआ है, जनता के विभिन्न हिस्सों में शील और शुचिता का उत्कर्ष हुआ है। नरेंद्र मोदी कह रहे हैं 56 इंच की छाती के बिना राष्ट्र निर्माण असंभव! मानो राष्ट्रनिर्माण नहीं, पुलिस में भर्ती चल रही है! राहुल गांधी मां-दादी की कहानियां सुना रहे हैं तो वामपंथी परिदृश्य से नदारद हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दंभ से कहते है, 'हां, मैं अराजकतावादी हूं!' उन्होंने साबित करने की कोशिश की कि जनहित में उनका धरना जरूरी था।


कभी महात्मा गांधी ने भी ऐसा ही कहा था, लेकिन शक है कि राजनीतिक दर्शन में अराजकतावाद को जिन अर्थों में जाना जाता है, उस बारे में केजरीवाल या उनके प्रबुद्ध दर्शनशास्त्री सजग होंगे। अराजक यानी राज का विसर्जन। ऐसा सुशासन कि न न्यायपालिका को हस्तक्षेप की जरूरत और न शासन के लिए नौकरशाहों की। अराजकतावाद की अवधारणा के प्रणेता तो विलियम गॉडविन थे, लेकिन इस विचार को लोकप्रियता दिलाई मिखाइल बकूनिन ने।

दरअसल राज्यहित एक लचीला, सुविधाजनक और भयंकर शब्द है। बकूनिन कहते हैं, ऐसे कोई पाप, लूट, आतंक, क्रूरता, नीचता भरे सौदे और बेहयाई से की हुई चोरियां नहीं है, जिन्हें राज्यहित के बहाने संरक्षण नहीं दिया जाता हो!
अराजकतावादी दर्शन की दृष्टि से हम एक अल्पतांत्रिक लोकतंत्र में जीते हैं, न कि सर्वतांत्रिक लोकतंत्र में। भारत में अराजकतावाद के बड़े पैरोकार क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने कहा था, 'स्वतंत्रता बहुत ही सीमित और औपचारिक होती है।

इतनी नपीतुली और नियंत्रित कि आम नागरिक उससे वंचित ही रहता है। राजनीतिक व्यवस्थाएं स्वतंत्रता के विरुद्ध और प्राकृतिक कानूनों के विपरीत होती हैं। इसलिए हम मुक्ति की बात करें! स्वतंत्र देश में जितनी भी विधायी संस्थाएं होंगी, उनके काम करने का तरीका मुट्ठीभर ऐसे लोगों को ही सहायक बनाएगा, जो चालाक और अतिस्वार्थी होंगे!
केजरीवाल हों या दूसरे नेता, जो चुनाव जीत जाते हैं, यही मानते हैं कि दूसरे सभी दलों को नाकाबिल मानकर मुझे जनादेश मिला है। बाकी सब अयोग्य। मैं ही श्रेष्ठ। मैं ही सबका भाग्यविधाता! मेरे सभी पाप अब पुण्य, बाकी सबके पुण्य अब पाप। जनता को मेरी आवश्यकता है। मेरे बिना उसका काम नहीं चल सकता। राजनीतिक विनम्रता कहीं नहीं दिख रही। प्रतिपक्षी दलों को साथ लेने का आग्रह कहीं नहीं। जरूरत व्यवस्था बदलाव की है न कि चेहरों और मोहरों के बदलाव की। ऐसी व्यवस्था की जहां, न्यायाधीशों, नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों से जुड़ी विधायी संस्थाएं प्रभुत्वशील मुट्ठीभर लोगों पर टिके अल्पतंत्र की सहायक नहीं बनें, बल्कि आम आदमी के बहुतंत्र के प्रति सजग और संवेदनशील रहे। साफतौर पर तो यह है कि सुशासन से रहित जनतंत्र किसी काम का नहीं, लेकिन सुशासन पर आधारित जनतंत्र भी अगर अच्छा गणराज्य नहीं तो उसका औचित्य क्या है!

लेखक दैनिक भास्कर राजस्थान के स्टेट ब्यूरो चीफ हैं।

tribhuvan@dainikbhaskargroup.com