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कठघरे में दवा उद्योग की साख

7 वर्ष पहले
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रेनबैक्सी कंपनी के खिलाफ अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (यूएसएफडीए) ने पहली चेतावनी 2008 में दी थी। उसके छह साल बाद तक कंपनी ने दवा उत्पादन के अपेक्षित मानदंड नहीं अपनाए। नतीजतन, पिछले हफ्ते यूएसएफडीए ने उसके पंजाब स्थित तोन्सा संयंत्र में बनी दवाओं की भी अमेरिका में बिक्री पर रोक लगा दी। तोन्सा संयंत्र में यूएसएफडीए के निरीक्षकों ने पाया कि सैंपल निर्माण स्थल तथा अनिर्मित सामग्रियों के भंडार में मक्खियां उड़ रही थीं। यूएसएफडीए ने वोकहार्ड कंपनी के दो संयंत्रों में उत्तम उत्पादन प्रक्रिया के उल्लंघन की पहचान की है। कुछ अन्य भारतीय कंपनियों को भी उसने चेतावनी दी है।

स्पष्टत: इस घटनाक्रम ने भारतीय दवा उद्योग की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। भारत से सालाना तकरीबन 15 अरब डॉलर की दवाएं अमेरिका निर्यात की जाती हैं। अब इस बाजार के हाथ से निकलने की आशंका है, लेकिन असली मुद्दा यह नहीं है। मुख्य चिंता सामने आई यह हकीकत है कि भारत और अमेरिका में दवाओं को बिक्री योग्य घोषित करने के लिए अपनाए जाने वाले मानदंडों में भारी अंतर है।

यूएसएफडीए ने तोन्सा संयंत्र के पहले रेनबैक्सी के जिन चार संयंत्रों की दवाओं पर रोक लगाई थी, वहां के नमूनों को भारतीय ड्रग महानियंत्रक (डीसीजीआई) के निरीक्षकों ने अपनी जांच के बाद ठीक बताया था। भारतीय दवा उद्योग का कहना है कि भारत अमेरिका जैसे मानदंड नहीं अपना सकता। वैसा हुआ तो लागत दो-गुनी हो जाएगी। क्या यह दलील मंजूर की जा सकती है? दवाओं का संबंध जीवन-मरण से है।

उनकी गुणवत्ता पर आखिर कैसे समझौता हो सकता है? डीसीजीआई की कसौटी यह है कि अंतिम उत्पाद सही है तो उसे स्वीकार्य माना जाएगा, जबकि यूएसएफडीए दवा बनाने की प्रक्रिया के दौरान भी स्वच्छता एवं तमाम मानदंडों के उचित पालन पर जोर देता है। क्या अब वक्त नहीं आ गया है जब डीसीजीआई दवा उद्योग के साथ मिलकर भारत में भी विश्वस्तरीय मानदंडों को लागू करने के इंतजाम करे? ऐसा कर दवा उद्योग भारतीयों की जान को कमतर समझने के इल्जाम से बचेगा और अपना वैश्विक बाजार भी बचा पाएगा। विवाद लंबा खिंच चुका है। आश्चर्य है कि सरकार ने इसके समाधान के लिए उचित तत्परता नहीं दिखाई है।