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बंदूक के साये में लोकतंत्र

8 वर्ष पहले
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बंदूक के साये में लोकतंत्र- यह जुमला अक्सर बतौर मुहावरा कहा जाता है, लेकिन पाकिस्तान के संदर्भ में यह शब्दश: लागू होता है। अगर ये साया नहीं होता तो आज पाकिस्तान के लिए गौरव का दिन होता, क्योंकि उसके साढ़े छह दशक के इतिहास में एक से दूसरी असैनिक सरकार के हाथ में सत्ता के हस्तांतरण का यह पहला मौका है।

लेकिन दहशतगर्दो की हिंसा के कारण अपेक्षाकृत उदारवादी राजनीतिक दल निर्भयता से अपना चुनाव प्रचार नहीं कर पाए। बम धमाकों, गोलीबारी, उम्मीदवारों एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अपहरण की लगातार जारी घटनाओं के बीच चुनाव स्थगित हो जाने की अटकलें भी लगती रहीं। इसलिए आज सबकी निगाहें ये देखने पर होंगी कि वास्तव में कितने लोग मतदान करने निकलते हैं।

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने मतदान बहिष्कार की अपील कर रखी है। वैसे, चर्चा यह है कि ये आतंकवादी संगठन गुपचुप दक्षिणपंथी दलों का समर्थन कर रहा है। इसी कारण जहां पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी), एएनपी और मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) चुनाव प्रचार नहीं कर पाए, वहीं पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) और इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) चुनावी जलसे निकालने में कामयाब रहे।

पांच साल सरकार चलाने के बाद पीपीपी वैसे भी अलोकप्रिय है, इसलिए राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव में नवाज शरीफ या इमरान खान में से किसी एक के सबसे मजबूत होकर उभरने का अनुमान लगा रहे हैं। बहरहाल, चुनाव के बाद पाकिस्तान की कैसी सियासी सूरत उभरती है, उस पर भारत समेत दुनिया के तमाम देशों की नजर है। अगर किसी को बहुमत नहीं मिला तो कमजोर सरकार बनेगी, जो सेना के अधिक प्रभाव में होगी।

वह मजहबी चरमपंथियों एवं दहशतगर्दो को रोकने में अक्षम होगी। 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के बाद क्षेत्र में पाकिस्तान की भूमिका अहम होगी। नई पाक सरकार आतंकवाद निर्यात की नीति पर चली तो इस क्षेत्र में अस्थिरता चिंताजनक रूप ले सकती है। पाकिस्तान में इससे नई अंदरूनी चुनौतियां भी पैदा होंगी। इस कारण पाकिस्तान के लिए इसे निर्णायक चुनाव माना जा रहा है।