भारतीय न्याय व्यवस्था इस सिद्धांत पर आधारित है कि भले ही कई दोषी छूट जाएं, लेकिन किसी निदरेष को सजा नहीं होनी चाहिए। इसलिए यह खुद हमारी संवैधानिक व्यवस्था की साख के लिए जरूरी है कि अगर कहीं कोई बेगुनाह- किन्हीं हालात में किसी मामले में फंस गया हो, तो उसके साथ यथाशीघ्र न्याय की उचित व्यवस्था की जाए।
हाल में मुस्लिम समुदाय में इस शिकायत के संकेत मिले हैं कि आतंकवाद के मामलों में बहुत-से निदरेष मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार किया गया है। इसलिए अगर कोई सरकार इस शिकायत को दूर करने की पहल करती है, तो उसका स्वागत किया जाएगा। लेकिन यह देखने की बात होगी कि क्या वो पहल वास्तविक और ईमानदार है, या उसके जरिये सियासी फायदा उठाने की कोशिश हो रही है?
यह सवाल हाल में उत्तर प्रदेश की घटनाओं के सिलसिले में उठा है। बीते हफ्ते बाराबंकी की एक अदालत ने राज्य सरकार की 2007 के गोरखपुर बम विस्फोट कांड में गिरफ्तार दो आरोपियों के खिलाफ मामले वापस लेने की याचिका खारिज कर दी। कुछ समय पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 2006 के वाराणसी बम कांड में गिरफ्तार दो आरोपियों पर से मामले हटाने की कोशिश को लेकर फटकार लगाई थी।
दरअसल, पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर आतंकवाद के मामलों में गिरफ्तार कथित निदरेष मुस्लिम नौजवानों को वह रिहा कर देगी। कोर्ट में याचिकाएं देकर वह अपना ये वादा पूरा करते दिखना चाहती है। लेकिन उसके अगंभीर रुख ने इस महत्वपूर्ण मसले को विवादास्पद बना दिया है। बाराबंकी कोर्ट ने ‘दोषपूर्ण और अधूरे’ दस्तावेजों के आधार पर याचिका पेश करने के लिए अभियोग पक्ष की खिंचाई की। वस्तुत: बिना सुनवाई पूरी हुए मुकदमों को उठाने की कोशिश ही सवालों के कठघरे में है।
अगर राज्य सरकार की प्राथमिकता इंसाफ है, तो उसका सिर्फ एक ही तरीका है कि मुकदमों की जल्द से जल्द सुनवाई हो, ताकि दोष-निदरेष का फैसला शीघ्र हो जाए। इसके लिए उचित तरीका फास्ट ट्रैक कोर्टो का गठन है, जहां दिन-प्रतिदिन सुनवाई हो। अगर अखिलेश सरकार ऐसा करती, तो वह सारे देश के लिए मिसाल कायम करती। मगर उसने मुद्दे को और उलझा दिया है।