बेहतर अमल की चुनौतियां

9 वर्ष पहले
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आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गो के उत्थान के लिए सरकार विशेष उपाय करे, यह भारत की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अक्सर ऐसे उपायों पर अमल में राजनीतिक इच्छाशक्ति एवं प्रशासनिक कुशलता लचर पड़ जाती है और घोषित कार्यक्रम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल दिखने लगते हैं।
ऐसा ही कुछ सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद उठाए गए कदमों के साथ हुआ लगता है। छह साल पहले सच्चर कमेटी ने भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन का कच्चा-चिट्ठा देश के सामने रख दिया था। उससे कई बने-बनाए भ्रम टूटे। यह जरूरत शिद्दत से महसूस की गई कि इस समुदाय के शैक्षिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए खास कदम उठाए जाने चाहिए।
तब यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के लिए अलग मंत्रालय बनाया और इस समुदाय को लाभ पहुंचाने के लिए कई कार्यक्रमों की घोषणा की। लेकिन सच्चर कमेटी के सदस्य रहे अबुसालेह शरीफ द्वारा तैयार एक ताजा रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि इन कदमों से गरीब मुसलमानों को मामूली फायदे ही पहुंचे हैं। अगर छात्रों को दिए जाने वाले वजीफे को छोड़ दें, तो बाकी मामलों में सरकार की पहल जमीन पर कोई बड़ा सकारात्मक असर पैदा करने में नाकाम है।
2004-05 और 2009-10 के नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के आंकड़ों के आधार पर तुलना करते हुए इस रिपोर्ट में यह दिखाया गया है कि उपरोक्त पांच वर्षो की अवधि में दसवीं कक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के स्तर तक मुस्लिम छात्रों के शिक्षा प्राप्त करने का प्रतिशत तो बढ़ा है, लेकिन यह बढ़ोतरी तमाम अन्य सामाजिक वर्गो की तुलना में बहुत कम है। औपचारिक रोजगार और वित्तीय सेवाओं के दायरे में इस समुदाय को लाने की कोशिशों में भी वांछित सफलता नहीं मिली है।
वर्तमान सरकार को निस्संदेह इन तथ्यों पर गहरा आत्म-मंथन करना चाहिए। समावेशी विकास को अपना लक्ष्य बताने वाली सरकार अपने इरादों को कार्यरूप देने में क्यों पिछड़ गई है? मुद्दा सिर्फ एक समुदाय के लिए बनाए गए कार्यक्रमों का नहीं है। सवाल यह है कि अगर बहुचर्चित कार्यक्रमों की दिशा में ठोस प्रगति नहीं हुई, तो अन्य कार्यक्रमों के बारे में क्या अनुमान लगाया जा सकता है?